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चौपाल: मुश्किल में दुनिया

ऐसे में इसकी गंभीरता को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें इसे रोकने के लिए कई प्रतिबंध लगा रही है। इन उपायों में जनता कर्फ्यू, सामाजिक दूरी रखने और पूर्ण बंदी जैसे कदम हैं। जाहिर है, महामारी को लेकर चिंता का माहौल है। भारत में इस महामारी को रोकथाम के बीच संगठित क्षेत्रों की अपेक्षा असंगठित क्षेत्र अत्यधिक प्रभावित हो रहा है।

Author Published on: April 7, 2020 1:12 AM
भारत में कोरोना पर काबू पाने के लिए पूर्ण बंदी पर सख्ती से अमल के अलावा सबसे जरूरी लोगों की जांच है।

कोरोना महामारी से भारत सहित विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हो रही हैं। चूंकि अभी यह महामारी खत्म नहीं हुई है और इससे प्रभावित लोगों की संख्या दस लाख को पार कर चुकी है, इसलिए दुनिया के सभी क्षेत्रों पर इसके परिणामों के बारे में निश्चित रूप से कुछ भी कह पाना संभव नहीं है। यूनाइटेड नेशनल कांफे्रंस एंड ट्रेंड एंड डेवलपमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर कोरोना वायरस की वजह से इस साल दुनिया भर को दो खरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हो सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति और सामाजिक ढांचे को देखते हुए इस महामारी के प्रभावों का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है, जिसमें औद्योगिक क्षेत्र से लेकर कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। दरअसल देश में कोरोना वायरस संक्रमण दूसरे चरण में पहुंच गया है।

ऐसे में इसकी गंभीरता को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें इसे रोकने के लिए कई प्रतिबंध लगा रही है। इन उपायों में जनता कर्फ्यू, सामाजिक दूरी रखने और पूर्ण बंदी जैसे कदम हैं। जाहिर है, महामारी को लेकर चिंता का माहौल है। भारत में इस महामारी को रोकथाम के बीच संगठित क्षेत्रों की अपेक्षा असंगठित क्षेत्र अत्यधिक प्रभावित हो रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था को 34.8 करोड़ डॉलर तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है। शेयर बाजार में अब तक निवेशकों के 50 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा स्वाहा है।
’दीपिका शर्मा, गोरखपुर

गरीब पर मार
गुरबत के मारों का अभूतपूर्व पलायन को देख कर एक कहावत याद आ गई कि ‘मरता क्या न करता’। आजादी के बाद इस सबसे बड़े पलायन को केंद्र सरकार भले ही सोशल मीडिया के दुष्प्रचार का परिणाम क्यों न कहे, पर सच्चाई यही है कि कई सौ किलोमीटर पैदल यात्रा कोई शौक से नहीं, बल्कि मजबूरी से कर रहा है। छोटे नियोक्ताओं ने अपने कामगारों को राहत देने की अपील को सिरे से नकार दिया। तभी एसी नौबत आई। जब सुविधाएं और वेतनवृद्धि देने की बात आती है तो केवल संगठित क्षेत्र के मुट्ठी भर कामगारों का ध्यान रखा जाता है। यानी नब्बे फीसद की सुध लेने वाला कोई नहीं है। अब बिना तैयारी के देशव्यापी पूर्ण बंदी से हर तबके की कमर टूट गई है।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी (जमशेदपुर)

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