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चौपाल: सहभागी राजनीति

राष्ट्रीय हितों के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार लिए जाने वाले महत्त्वपूर्ण निर्णयों में भी समस्त राजनीतिक दलों की भागीदारी अपेक्षित होती है। लेकिन इसमें भी राजनीतिक पूर्वाग्रह आड़े आता है।

हिंदी भाषी राज्‍यों में राजनीतिक बदलाव की संभावना।

परस्पर विरोधाभासी नीतियों के बावजूद विभिन्न राजनीतिक दलों के गठबंधन सत्ता को साध्य मानते हुए किए जा रहे हैं। राजनीतिक गतिविधियों में अवसरवादी मनोवृत्ति चरम पर है। सत्तासीन दल का विरोध नीतियों पर उतना आधारित नहीं है, जितना कि व्यक्तिगत पसंदगी या नापसंदगी को लेकर है। व्यक्तिगत दुराग्रह का यह सिलसिला राजनीति में नफरत का बीजारोपण करते हुए लोकतंत्र की अवधारणाओं को तार-तार कर रहा है। लोकतंत्र में राजनीति जनसेवा का सशक्त माध्यम होती है, लेकिन राजनीति में वर्चस्व का द्वंद राजनीतिक सौहार्द्र को तहस-नहस कर रहा है। आश्चर्य का विषय है कि व्यापक जनहित के प्रति समर्पित मनोभाव से की जाने वाली राजनीति आपसी टकराहट का कारण क्यों बनती है?

आम नागरिकों के अधिकतम हित साधन में तौर-तरीके अलग-अलग दलों के अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन उद्देश्य तो एक समान ही होता है कि राष्ट्र के समग्र कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया जाए। व्यावहारिक रूप से राजनीतिकों की राजनीतिक गतिविधियों को देखते हुए ऐसा प्रतीत नहीं होता कि वे सेवा और समर्पण के मनोभाव के साथ राजनीति कर रहे हैं। लोक कल्याण की भावना से राजनीति में समर्पण प्रकारांतर से मानव सेवा को समर्पित धर्मपालन के समकक्ष ही तो है। और कुछ नहीं तो राष्ट्रधर्म का परिपालन तो सुनिश्चित रूप से है ही। लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लोकतंत्र के अब तक के इतिहास में ऐसे अवसर बहुत कम ही आए होंगे, जब राष्ट्रहित के मद्देनजर प्रतिपक्षी दलों ने सत्तापक्ष के सुर में सुर मिलाया हो। दरअसल, एक दूसरे के दल को अस्थिर कर देने का नाम राजनीति नहीं हो सकता।

राष्ट्रीय हितों के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार लिए जाने वाले महत्त्वपूर्ण निर्णयों में भी समस्त राजनीतिक दलों की भागीदारी अपेक्षित होती है। लेकिन इसमें भी राजनीतिक पूर्वाग्रह आड़े आता है। इन तमाम परिस्थितियों में होना यह चाहिए कि विभिन्न राजनीतिक दल अपनी-अपनी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहकर भी व्यापक राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों को लेकर राजनीति करने से परहेज करें। अन्यथा शह और मात की राजनीति में राष्ट्र के नवनिर्माण की परिकल्पनाओं को मूर्त रूप दिया जाना संभव नहीं होगा। राष्ट्र का समग्र उत्थान सत्तारूढ़ दल की जिम्मेदारी होती, लेकिन उन समस्त राजनीतिक दलों की साझेदारी भी इसमें सुनिश्चित होना चाहिए जो जनहित के प्रति समर्पित होते हैं। ऐसा होने पर ही राजनीति में शुचिता और पवित्रता का स्वर्णिम युग हमें नित नई ऊंचाइयों की ओर ले जाएगा।

’राजेंद्र बज, हाटपीपल्या, देवास, मप्र

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