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चौपालः कथनी बनाम करनी

मनमोहन सिंह जैसे कमजोर प्रधानमंत्री ने देश का बेड़ा गर्क कर दिया और मोदी जैसा 56 इंची सीने वाला नेता ही इस देश को तार सकता है।’-

Author May 7, 2016 2:08 AM
पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के साथ पीएम मोदी

मनमोहन सिंह जैसे कमजोर प्रधानमंत्री ने देश का बेड़ा गर्क कर दिया और मोदी जैसा 56 इंची सीने वाला नेता ही इस देश को तार सकता है।’- ऐसी तमाम बातों से लोगों को भ्रमित करके सत्ता में पहुंची भाजपा, शासन चलाने में कमजोर कहे जाने वाले मनमोहन सिंह से भी ज्यादा विफल रही है। इसके दो साल के शासन में महंगाई बेलगाम है, बेकारी से युवा परेशान हैं। न महिलाएं सुरक्षित हैं, न दलित, न आम नागरिक। देश के 256 जिलों में 33 करोड़ लोग सूखे का सामना कर रहे हैं।

किसानों की आत्महत्या और पानी के लिए मचे हाहाकार की खबरों के बीच भी इस कथित शक्तिशाली 56 इंची सीने वाले के शासन में न कोई जाग है, न संवेदना। तेलगांना में राहगीर एक महिला प्यास के मारे बच्चों को पेड़ के नीचे बैठा कर पानी की तलाश में खुद बेहोश गई। मां लौट पाती उससे पहले ही प्यासे बच्चे काल के ग्रास बन गए। इसी तरह लातूर में पानी ढोते-ढोते एक बच्ची काल-कलवित हो गई। रोटी तो दूर, सरकार पीने का पानी तक मुहैया नहीं करा पाई है। पानी के लिए लोग रात-रात भर जाग रहे हैं, जहां कहीं मिले, मीलों दूर से ढोकर ला रहे हैं। हलक को पानी तो मिले, पीने योग्य और शुद्ध किसने देखा है! कहीं दूर नहीं, राजस्थान की राजधानी जयपुर में ही समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित गृह में तेरह दिनों के भीतर बारह विमंदित बच्चे घोर प्रशासनिक लापरवाही के बीच दूषित पानी के सेवन से बेमौत मर गए।

एक तरफ सूखा तो दूसरी तरफ आग। उत्तराखंड और हिमाचल के जंगलों में लगी आग बारिश होने तक बुझने में नहीं आई। आरक्षण की आग में हरियाणा जल उठा तो गुजरात भी। वहीं देश की सीमा भी संताप में रही। संसदीय समिति ने भी सीमा पर बरती घोर लापरवाही पर चिंता जताई है। एक तरफ आतंकी जोर, घुसपैठ और गोलीबारी तो दूसरी ओर पाकिस्तान से यारी, चिरौरी जारी है। कश्मीर को लेकर मोदी सरकार के यू-टर्न जारी हैं, हुर्रियत भारी है, तभी तो वार्ता क्या, सत्ता में भी चाहे-अनचाहे उसकी भागीदारी है। जुमलों की मारी जनता फिरती मारी-मारी है। मोदी का नारा था ‘न्यूनतम शासन अधिकतम प्रशासन’। लोग दांतों तले अंगुलियां दबा कर पूछते हैं- यह कैसे होगा भला? सरकार कहती है, उसे करना ही क्या है! ऐसी स्थिति में जब जनता का कहीं काम न हो, तब आखिर वह जाए कहां? संसद हो या विधानसभा, ये सुनते नहीं, कहते हैं।

जनता आखिर जाए, तो जाए कहां, अपनी बात कहे तो कहां? ले-देके अदालतें बची हैं, जहां जनहित याचिकाओं के माध्यम से वह अपना रोना लेकर वह पहुंच जाती है। अदालतें भी मन आए तो सुन लेती हैं और कभी-कभार ऐसी डांट फटकार लगाती हैं कि सरकार की सिट््टी-पिट््टी गुम हो जाती है। जनता को भी काम हो, न हो, दिलासा जरूर मिल जाता है। याची खबरची इस ‘न्यायिक सक्रियता’ को भी लोकतंत्र के लिए खतरा बताने से नहीं चूकते हैं। सरकार में जो कुछ हो रहा है, चहेते पूंजीपतियों के लिए हो रहा है, जनता के लिए तो बस कभी-कभार न्यायालय के हस्तक्षेप से कुछ हाथ लग जाता है।
’रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर

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