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चौपाल : नकारात्मक राजनीति

पिछले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत की बात उठाई थी और जब-जब चुनाव में कांग्रेस की पराजय हुई, उनके समर्थकों को लगा कि यह उक्ति चरितार्थ हो रही है।

Author नई दिल्ली | June 9, 2016 3:42 AM
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह

पिछले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत की बात उठाई थी और जब-जब चुनाव में कांग्रेस की पराजय हुई, उनके समर्थकों को लगा कि यह उक्ति चरितार्थ हो रही है। कांग्रेस देश की बड़ी राजनीतिक पार्टी है और हाल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम के विश्लेषण भी सिद्ध करते हैं कि उसकी राष्ट्रव्यापी उपस्थिति और अहमियत कायम है। कांग्रेस मुक्त भारत की बात वैसे भी लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं दिखाई देती है। एक जनतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रव्यापी सशक्त विपक्ष का होना देश और जनतंत्र के लिए आवश्यक है।
एक अन्य आयाम से विचार करें तो सबसे अलग दिखने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने आर्थिक और अन्य नीतियों के साथ व्यवहार्यता में कांग्रेस के सभी चारित्रिक गुणों को अपना लिया है और कल्पना करें कि कांग्रेस नाम की राजनीतिक पार्टी का अस्तित्व न भी रहे तो ऐसी स्थिति में क्या भारत कांग्रेस मुक्त हो पाएगा? आज सामान्यजन के लिए भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस के एक संस्करण के अलावा क्या है!

समाजवादी चिंतक डॉ राममनोहर लोहिया ने सर्वप्रथम गैरकांग्रेसवाद का नारा दिया था। उनका नारा उनकी दृष्टि के अनुरूप व्यापक था जिसमें सभी राजनीतिक दलों को कांग्रेस के विरुद्ध एकजुट करके देश के सामने एक ठोस विकल्प प्रस्तुत करना था। इसके सार्थक परिणाम निकले और 1967 में कई प्रदेशों में संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनीं। बाद में कई क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ और कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हुआ। आपातकाल के बाद जनता पार्टी का बनना, बिखरना और जनसंघ के नवीन संस्करण भारतीय जनता पार्टी का उभार और सफलताएं उसी की परिणति हैं।

मोदी की तर्ज पर अब नीतीश कुमार भी संघमुक्त भारत की बात कर रहे हैं। इसके क्या निहितार्थ हैं? दोनों का मंतव्य अपने और अपने दल के लिए मतों का ध्रुवीकरण ही है। क्या यह एक सही और सकारात्मक राजनीति है? सही और सकारात्मक राजनीति के लिए कांग्रेस मुक्त या संघमुक्त भारत की बात करने के बजाय वैकल्पिक, जनोन्मुखी आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों को अग्रसर करने की जरूरत है।

सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर

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