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चौपाल : कांग्रेस का हाल

समाज में ऐसा अक्सर होता है कि सफलता मिलने पर लोग व्यक्ति की तारीफ करते नहीं थकते और विफल होने पर उसमें बुराइयां और कमियां खोजने लगते हैं। इस दृष्टि से हाल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद कांग्रेस पर विपक्ष और पत्रकारों के हमले स्वाभाविक हैं। लेकिन एक सौ तीस […]

नई दिल्ली | May 30, 2016 12:30 AM
भारत निर्वाचन आयोग

समाज में ऐसा अक्सर होता है कि सफलता मिलने पर लोग व्यक्ति की तारीफ करते नहीं थकते और विफल होने पर उसमें बुराइयां और कमियां खोजने लगते हैं। इस दृष्टि से हाल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद कांग्रेस पर विपक्ष और पत्रकारों के हमले स्वाभाविक हैं। लेकिन एक सौ तीस साल पुरानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिस तरह सिकुड़ रही है और केवल छह प्रतिशत लोगों और छह राज्यों में उसका शासन रह गया है वह सबके लिए हैरानी की बात है।

दिसंबर 2013 में दिल्ली विधानसभा और 2014 में लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को जब शर्मनाक हार का मुंह देखना पड़ा उसके शीर्ष नेता ‘आत्म-मंथन’ और ‘समीक्षा’ की बात कहते-दुहराते गए, लेकिन असल में क्या किया गया, कभी प्रकट नहीं हुआ। कांग्रेस में हार की जिम्मेदारी सोनिया और राहुल गांधी पर डालने का साहस किस कार्यकर्ता में है? नेतृत्व खुद जिम्मेदारी लेने की बात कहता नहीं सुनाई देता, पद त्याग करना तो दूर की बात है। वैसे कांग्रेस से अगर गांधी परिवार आज हट भी जाए तो उसका संकट अटल दिखता है, क्योंकि साठ साल तक गांधी-नेहरू परिवार ने जिस तरह एकछत्र पार्टी को चलाया है उससे आंतरिक लोकतंत्र पनपा ही नहीं, न नए-पुराने किसी कार्यकर्ता को नेतृत्व क्षमता बढ़ाने-दिखाने का अवसर मिल पाया। एक व्यक्ति या परिवार पर आश्रित राजनीतिक या सामाजिक संगठन के टिकाऊ होने की ज्यादा उम्मीद नहीं रहती। व्यक्ति पूजा, चाटुकारिता, तानाशाही आदि अंतत: संगठन को गर्त में ही डालते हैं।

हाल के सालों में, खासकर यूपीए-2 के समय कांग्रेस के नेतृत्व और उससे जुड़े लोगों पर भ्रष्टाचार के एक के बाद एक आरोप लगने से भी पार्टी की छवि को जबर्दस्त नुकसान हुआ है। इसके अलावा पार्टी में असंतोष है, जिससे नेतृत्व को कोई मतलब नहीं दीखता। उत्तराखंड में हाल का नाटक और पूर्व मुख्यमंत्री सहित नौ विधायकों का बगावत करना यही दिखता है कि अंदर कितनी गड़बड़ है। कांग्रेस खुद सुधरेगी या उसका प्रदर्शन सुधरेगा इसकी संभावना कम ही नजर आती है।

’कमल जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड


पिछला सबक

हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा दिया गया जाट आरक्षण रद्द कर दिया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट भी पिछली सरकार के आरक्षण के आदेश पर रोक लगा चुका है। इसके बावजूद मौजूदा सरकार ने आंदोलन की स्थितियां नियंत्रित करने के बजाय हथियार डालते हुए फिर से आरक्षण की घोषणा कर दी।

देश के कई हिस्सों में ऐसे आंदोलन भड़क रहे हैं और अक्सर दबाव में आकर सरकारें वोट बैंक बचाए रखने के लिए झुक कर फैसले ले लेती हैं। ऐसे वक्त में हाईकोर्ट का फैसला बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि किसी खास समुदाय की जनभावना का दबाव सरकारों को कुछ भी करने के लिए नहीं झुका सकता। नहीं तो फिर हर मामले में कोई न कोई समुदाय आंदोलन करता रहेगा।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद कई संगठनों ने विद्रोह की धमकी दी है। हमें खयाल रहे कि अभी पिछले आक्रोश में जान-माल की कुर्बानी दे चुके लोगों के जख्म हरे हैं। हाईकोर्ट के निर्णय के विरोध में फिर इन समुदाय लोगों को भड़काया जाएगा। राजनीतिक दल उनका इस्तेमाल अपने हित में करेंगे। हरियाणा सरकार मुस्तैद रहे और पिछली बार की गलतियां न दोहराए। क्योंकि पिछले आंदोलन की तबाही की जांच अभी हो भी नहीं पाई है, ऐसे में किसी और बवाल के लिए राज्य में कोई गुंजाइश बाकी नहीं है।

’विनय कुमार, दिल्ली


गजल के साथ

पिछले तीन-चार दशकों में हिंदी गजल की जन स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी है। आज सामाजिक और राजनीति संदर्भों में उर्दू की रूमानी गजलों की बनिस्पत हिंदी कवियों के शेर ज्यादा सुनाई दे रहे हैं, तो इसकी सबसे बड़ी वजह इन गजलों की जनपक्षधरता है। हां, यह जरूर है कि आलोचकों के इस विधा को अनदेखा करने से कवियों में एक तरह की बेचैनी भी है और क्षोभ भी जिसकी चर्चा ज्ञानप्रकाश विवेक के लेख ‘हिंदी गजल और आलोचकीय बेरुखी’ (22 मई) में विस्तार से की गई है। उनकी यह बात बिलकुल सही है कि दुविधाओं का मारा हिंदी आलोचक अपनी सुविधा, समझ और अवसर के इस्तेमाल में पर्याप्त माहिर है और इसी कारण आमजन को कविता की जमीन जिधर बंजर दिखाई देती है, हमारे आलोचक उधर एक स्वर से हरियाली का कोरस गा रहे हैं। इसका एक स्पष्ट कारण यह भी है कि छांदस विद्याओं पर कलम चलाने के लिए उनके पास अपेक्षित तैयारी ही नहीं है।

यह सच है कि बाजारवादी प्रलोभनों और शर्तों के दबाव में मंचों की दुनिया गजलों का चेहरा बिगाड़ रही है जिससे इन्हें खारिज करने का एक आसान बहाना आलोचक को मिल गया है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है और वह यह कि गद्य कविता की भीड़ में भी हिंदी गजल का एक जनधर्मी, जनसंवादी और जनप्रिय पक्ष निर्मित हुआ है और आलोचकों की बेरुखी से भी इसकी गति, धार और उत्साह में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। अनेक महत्त्वपूर्ण कवि आज भी हिंदी कविता की मुख्य धारा की नई दिशा तय करने में लगे हैं जो यह साबित करता है कि समकालीन हिंदी गजल अपनी व्यापक जनचेतना और दायित्व बोध के बूते अपनी राह बनाना बखूबी जानती है।

’विनय मिश्र, अलवर


प्रदूषण के विरुद्ध

आजकल गांव-कस्बों तक में प्रदूषण बहुत बढ़ गया है। अगर कोई व्यक्ति रास्ते से गुजरता है तो उसके चेहरे पर धूल-मिट्टी चिपक जाती है। कोई मोटर साइकिल से बिना हेलमेट गांव या कस्बों से गुजरता है तो महसूस होता है कि आंखों में धूल भर गई है। सड़क किनारे स्थित मिट्टी की ऊंचाई अगर सड़क से अधिक है तो वह मिट्टी गाड़ियों के टायरों से सड़क पर आ जाती है और फिर गाड़ियों के पीछे उड़ती रहती है। इससे सड़क के आसपास के घरों-दुकानों में धूल-मिट्टी जाती रहती है। दूसरा नुकसान यह होता है कि जब भी कभी बारिश होती है तो पानी सड़क से बह कर कच्ची मिट्टी में जाने के बजाय सड़क पर ही पड़ा रहता है जिससे सड़कें जल्दी टूट जाती हैं। ऐसी छोटी-सी गलती का कई लोगों को नुकसान भुगतना पड़ता है। सब जगह ऐसा हो रहा है। यहां तक कि शहरों के पढ़े-लिखे लोग भी अपने घर और सड़क के बीच की मिट्टी को सड़क से ऊंचा रखते हैं। सरकार को ऐसा कोई नियम बनाना चाहिए जिससे सड़कों पर मिट्टी इकट्ठी न हो पाए और वे बरसाती नाला न बनें।

’राज सिंह रेपसवाल, सिद्धार्थ नगर, जयपुर

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