कांग्रेस का हाल

पिछले कुछ दिनों से हर राजनीतिक दल का ध्यान पंजाब पर टिका हुआ है।

पंजाब कांग्रेस संकट में। फाइल फोटो।

पिछले कुछ दिनों से हर राजनीतिक दल का ध्यान पंजाब पर टिका हुआ है। अब पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू का भी इस्तीफा आ गया, जो कांग्रेस पार्टी के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। कांग्रेस पार्टी का गढ़ कहे जाने वाले पंजाब में पार्टी की कमान नवजोत सिंह सिद्धू को सौंपे जाने के बाद से ही तरह-तरह की बातें सामने आने लगी थीं। आखिर कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। मुख्यमंत्री का पद चरणजीत सिंह चन्नी के हाथों मे सौंपने के दो दिन बाद ही कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू को भी इस्तीफा देना पड़ा है।

पंजाब में ऐसी क्या गड़बड़ी हो रही है, जिससे पार्टी के बड़े-बड़े चेहरे नेतृत्व छोड़ते जा रहे हैं। पार्टी सदस्यों का मानना है कि पंजाब में कांग्रेस को संभालने के लिए राहुल गांधी सहित कांग्रेस के बड़े नेताओं द्वारा दिए जा रहे दिशा-निर्देश गलत साबित हो रहे हैं। क्या राहुल गांधी सच में पंजाब सरकार को संभालने में विफल साबित हो रहे हैं, ऐसा नहीं तो पंजाब में कांग्रेस की कमान सिद्धू के हाथों में आते ही उन्होंने क्यों सरकार के विरुद्ध बोलना शुरू कर दिया था। तो क्या राहुल गांधी का पंजाब पर ध्यान नहीं था? पार्टी नेतृत्व के लिए अगर सही फैसला नहीं किया गया, तो पंजाब में कांग्रेस की कमजोरी विपक्ष के लिए अच्छी खबर साबित हो सकती है।
’मुकेश कुमार, मोतिहारी (पूर्वी चंपारण)

गन्ने का भाव

उत्तर प्रदेश में इस साल गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ा कर साढ़े तीन सौ रुपए किया गया है। किसान यूनियन इससे असंतुष्ट है। उसे साढ़े चार सौ का भाव चाहिए। वर्तमान में जो चीनी का मूल्य चल रहा है, उसमें साढ़े तीन सौ से ज्यादा की गुंजाइश नहीं बनती। यूपी के बाद सबसे अधिक चीनी मिलें महाराष्ट्र में हैं। वहां गन्ने का भाव 285 रुपए है। किसान यूनियन और उसके प्रवक्ता राकेश टिकैत वहां आंदोलन क्यों नहीं करते? क्या इसलिए कि वहां मिल मालिक या तो शरद पवार और उनकी पार्टी के नेता हैं या कांग्रेसी? और ये पार्टियां किसान यूनियन की समर्थक हैं।

इसलिए उन्हें किसानों के शोषण का हक है! यूपी ज्यादा भाव दे रहा है, पर टिकैत का सारा नजला यहीं गिर रहा है। तमिलनाडु में तो गन्ने का भाव महज ढाई सौ रुपए क्विंटल है, पर डीएमके का समर्थन यूनियन को है, इसलिए वहां की सरकार टिकैत के किसी विरोध से बेपरवाह है। स्पष्ट है कि किसान यूनियन अपने राजनीतिक मित्रों और मिल मालिकों के हित में काम करती है, न कि किसानों के, जिनके जमावड़े के बल पर इसने अपना दबदबा बना रखा है।
’अजय मित्तल, मेरठ

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