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चौपालः रंग बेरंग

होली के रंग मानव जीवन के विभिन्न उतार-चढ़ावों को व्यक्त करते हैं जैसे हंसना-रोना, रूठना-मनाना, सुख-दुख, गम-खुशी, गुस्सा-प्यार। ठीक वैसे ही जैसे लाल, पीला, नीला, काला, हरा रंग प्रकृति के मूड को व्यक्त करते हैं।

Author March 24, 2016 4:07 AM

होली के रंग मानव जीवन के विभिन्न उतार-चढ़ावों को व्यक्त करते हैं जैसे हंसना-रोना, रूठना-मनाना, सुख-दुख, गम-खुशी, गुस्सा-प्यार। ठीक वैसे ही जैसे लाल, पीला, नीला, काला, हरा रंग प्रकृति के मूड को व्यक्त करते हैं। रंग प्रतीक हैं खुशियों के, जिंदादिली के, आशाओं के और उल्लास के। संभवत: इसीलिए होली यानी रंगों का त्योहार लोकप्रिय त्योहारों में गिना जाता है। रंग, जिनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती, सोचिए कितने अहम हैं हमारे लिए! हर त्योहार के पीछे एक इतिहास छिपा है जिससे सब परिचित होते हैं। इस इतिहास को हमारी पूर्व पीढ़ियां विभिन्न त्योहारों के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का काम बखूबी करती आई हैं। पर देखा जाए तो इन सब त्योहारों के मूल में केवल एक भावार्थ छिपा है और वह है खुशियां मनाना। दीपावली हो या होली, सभी त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक हैं, जो हमें संदेश देते हैं कि अपने अंदर की बुराई, कटुता, मनमुटाव को समाप्त करें और जीवन के व्यस्ततम क्षणों में से कुछ पल सुकून और खुशी के निकालें ताकि जीवन के वास्तविक अर्थ को समझा जा सके। आपस में खुशियों को बांटना, एक-दूसरे के गम समेटना, रूठों को मनाना और परायों को अपना बनाना यह सब इस रंगोत्सव पर सरलता से हो जाता है।

जब हर त्योहार हर्षोल्लास से जीवन जीने का संदेश देता है तो फिर क्यों त्योहारों की मिठास कम होती जा रही है, होली के रंग क्यों फीके पड़ते जा रहे हैं, क्यों अब त्योहार के दिन को केवल छुट्टी या आराम करने का दिन माना जाने लगा है, क्यों अब परिवारों को मॉल में घुमा कर या फिल्म दिखा कर इन त्योहारों की औपचारिकता पूरी कर ली जाती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये त्योहार पहचान हैं हमारी अस्मिता के, हमारे धर्म के, हमारी संस्कृति और वजूद के। पूर्व के समय में साधन-संपन्नता की कमी होने के बावजूद हमारे बुजुर्ग जीवन को अनेक खुशियों के रंगों से भर देते थे तो फिर अब क्यों हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, हम क्यों अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं? संभवत: हमारा जवाब होता है अब हमारे पास इतना समय नहीं है।

कहां गया यह समय आखिर? दिन, महीने, घंटे पहले भी इतने ही थे और आज भी, तो फिर समय कहां गया? सोचने का विषय है कि जिस खुशी को पाने के लिए हम खुद को व्यस्त करते जा रहे हैं अब उस खुशी को मनाने के लिए ही वक्त नहीं है। जो खुशियां हमने अपने बचपन और यौवन में जीं उनसे आने वाली पीढ़ी को क्यों वंचित रख रहे हैं? प्यार, विश्वास, अधिकार जैसे मूल्य अब गायब हो रहे हैं। अब सामान की तरह भावनाएं भी आनलाइन हो गई हैं और इसलिए शायद त्योहारों की खुशियां भी आनलाइन लेने की कोशिश में हम जीवन के वास्तविक रंगों से दूर होते जा रहे हैं। यह हम सभी के लिए गहन चिंतन का विषय है जिस पर अभी चिंतन नहीं किया तो शायद बहुत देर हो जाएगी।
’संदीप मदान, कोटा

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