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चौपालः गंगा मैली

गंगा जिस भी चीज के कारण प्रदूषित हो रही है, उसे गंगा से दूर रखा जाए। यदि मान्यताएं और परंपराएं भी गंगा को दूषित करती हैं, तो उन्हें भी गंगा से दूर किया जाना चाहिए।

गंगा मैली

कानपुर आइआइटी के सेवानिवृत्त प्रोफेसर और पर्यावरणविद डॉ जीडी अग्रवाल ने गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए एक बहुत ही सुलझा हुआ विचार प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार गंगा जिस भी चीज के कारण प्रदूषित हो रही है, उसे गंगा से दूर रखा जाए। यदि मान्यताएं और परंपराएं भी गंगा को दूषित करती हैं, तो उन्हें भी गंगा से दूर किया जाना चाहिए। यह सर्वविदित है कि हमारे देश के लोगों के अनेक धार्मिक विश्वास और आस्थाएं गंगा के साथ जुड़ी हैं जिनकी पूर्ति के लिए लोग बनारस, हरिद्वार और गंगा सागर आदि तीर्थों पर जाकर अनुष्ठान तो पूर्ण कर लेते हैं लेकिन इन धार्मिक क्रियाओं को करते समय गंगा के भीतर जो सामग्री कचरे के रूप में प्रवाहित की जाती है, वह इसके प्रदूषकों में से एक बड़ा प्रदूषक सिद्ध होती है।

यह बहुत अफसोसनाक है कि अपनी कुछ अवैज्ञानिक मान्यताओं और अंध श्रद्धाओं के चलते हमने पवित्र मान कर पूजी जाती रही नदियों को भी कूड़े-कचरे और मल-मूत्र की वाहक बना दिया है। चाहे बनारस के घाटों पर अधजले शवों को गंगा में बहाया जाना हो अथवा दुर्गा, सरस्वती, गणेश आदि की मूर्तियों का विसर्जन, इस तरह के अनेक अविचारपूर्ण कृत्य होते चले आ रहे हैं जिन्हें यदि प्रतिबंधित नहीं किया गया तो नदियों और नालों के पानी में कोई अंतर नहीं रह जाएगा। कैसी विडंबना है कि नदियों को हमने मनुष्य का दर्जा तो दे दिया है लेकिन उन पर प्रदूषण के माध्यम से अत्याचार भी हमीं कर रहे हैं। यदि एक ओर गंगा किनारे के उद्योगों, कारखानों और सीवेज व्यवस्था को गंगा से दूर करने का जिम्मा सरकार का है तो अवैज्ञानिक परंपराओं और रीतियों को बदलने का दायित्व उन लोगों का है जो गंगा को मोक्ष का द्वार मानते हैं। यह तो उन्हें भी समझना होगा कि यदि गंगा ही नहीं रही तो जीवन की संभावनाओं के साथ मोक्ष के द्वार भी बंद हो जाएंगे।

सुमन शर्मा, रोहिणी, दिल्ली

अर्थव्यवस्था में महिलाएं

मेकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट ने दावा किया है कि अगर भारत में लैंगिक समानता कायम हो जाती है तो किसी भी अन्य देश की तुलना में भारत की अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और इससे वर्ष 2025 तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद में सात अरब डॉलर जुड़ने की संभावना है। लेकिन यह अफसोसनाक सच्चाई है कि हमारी अर्थव्यवस्था के कुल श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी अन्य एशियाई देशों नेपाल, म्यांमा, वियतनाम, श्रीलंका, कंबोडिया की तुलना में सबसे कम है। यहां अधिकतर महिलाएं ग्रामीण क्षेत्र में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में कार्यरत हैं। कार्यस्थल पर सुरक्षा का अभाव, दिनोंदिन घटते रोजगार के अवसर, पितृसत्तात्मक मानसिकता, समान पारिश्रमिक जैसे मुद्दे महिलाओं की उद्यमी प्रवृत्ति और रचनात्मकता को उभरने नहीं देते। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं को शामिल किए बगैर देश का समावेशी विकास और नए भारत की संकल्पना पूरी होती दिखाई नहीं देती।

इस संदर्भ में स्वामी विवेकानंद की उक्ति ‘जब तक महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं होगा तब तक विश्व के कल्याण की कोई संभावना नहीं’, बहुत प्रासंगिक है। इसलिए महिलाओं को श्रम बल में शामिल करने के लिए उन्हें कृषि क्षेत्र से इतर रोजगार के अतिरिक्त अवसर प्रदान करने होंगे और कौशल संवर्धन कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना होगा। तभी कार्यस्थल पर पर्याप्त सुरक्षा और समान पारिश्रमिक मुहैया करा कर महिलाओं के नेतृत्व में विकास की ओर बढ़ने की प्रधानमंत्री की संकल्पना को पूरा किया जा सकता है।

पुष्पेंद्र पाटीदार, राउ जिला, इंदौर

 

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