मैदान पर दावा

तोक्यो पैरालंपिक खेलों में इस बार भारतीय खिलाड़ियों ने कीर्तिमान रचा है।

सांकेतिक फोंटो।

तोक्यो पैरालंपिक खेलों में इस बार भारतीय खिलाड़ियों ने कीर्तिमान रचा है। भारत के कुल चौवन पैरा-एथलीटों ने इसमें हिस्सा लिया था और कुल उन्नीस पदक जीत कर दुनिया में चौवींसवां स्थान हासिल किया है। मुख्य ओलंपिक खेलों से भी इसमें हमारा प्रदर्शन श्रेष्ठ कहा जा सकता है। महिला खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी काबिलेतारीफ रहा।

अवनि ने तो एक ही ओलंपिक में दो पदक जीत कर रेकॉर्ड स्थापित किया। जिसे समाज शारीरिक अक्षमता की शक्ल में देखता है, उसी को हमारे खिलाड़ियों ने अपना हौसला बनाया और उनके हौसले की उड़ान ने उनकी काबिलियत को साबित कर दिया जुनून और आत्मविश्वास के आगे कोई भी बाधा निष्क्रिय साबित होती है। खेल का माहौल सुविधाएं और संसाधन भी इसमें महत्त्वपूर्ण रोल अदा करते हैं। सरकार का प्रोत्साहन भी खिलाड़ियों में खेल संस्कृति को विकसित करने में अहम भूमिका निभाता है।
’ललित महालकरी, इंदौर, मप्र

विषम विकास

‘सिकुड़ते मध्यवर्ग का संकट’ (लेख, 7 सितंबर) पढ़ा। देश में कई दशकों से गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, लेकिन गरीबी घटने के बजाय बढ़ती चली जा रही है। इसका मूल कारण असमानता है और अब तक किसी भी सरकार ने ऐसी नीति नहीं बनाई, जिससे असमानता कम हो। समानता लाने के लिए अनेक सुझाव दिए गए, जैसे भूमि सुधार कानून लागू करना। लेकिन इसमें कोई सरकार हाथ डालना नहीं चाहती है। भूमि के गैरबराबरी वितरण से भूमिहीन दो गज जमीन के लिए तरस रहे हैं तो बड़े-बड़े भूस्वामी पुश्त-दर-पुश्त बेच-बेच कर एशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं और इसी को अपनी काबिलियत समझ रहे हैं।

इसी तरह शिक्षा में असमानता एक गंभीर समस्या है। एक तरफ सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का अभाव, पाठ्यक्रम में अंतर, दूसरी तरफ अंग्रेजी स्कूल हर साधनसंपन्न से लैस होते हैं। अभी भारतीय अरबपतियों की संपत्ति में पैंतीस फीसद का इजाफा हुआ है, बाकी मध्यवर्गीय परिवार से 3.2 करोड़ लोग निम्न वर्ग में गए हैं।

मध्यवर्गीय परिवार का पैमाना है कि रोजाना साढ़े सात सौ रुपए से लेकर पंद्रह सौ रुपए की कमाई है। 2021 में कृषि और उद्योग को छोड़कर बाकी सभी क्षेत्रों व्यापार, निर्माण, विनिर्माण, खनन क्षेत्र व्यापक रूप से प्रभावित हुए हैं। इस असमानता की जड़ नई आर्थिक नीतियां हैं जो पूंजीपतियों की पोषित कर रही हैं। आज मध्यवर्गीय लोग शांत है, लेकिन यही शांति उन्हें भविष्य में गुलाम करने के लिए काफी है। आज व्यक्तिवाद का बढ़ावा, एकल परिवार, दिखावे के चलन, अदम्य लालसा, सामाजिक सरोकारों में बदलाव, संवेदनशून्यता ने हमें मिट्टी की मूरत बना कर छोड़ दिया है।
’प्रसिद्ध यादव, बाबूचक, पटना, बिहार

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