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चौपालः आरक्षण पर मंथन

हाल ही में रांची के एक कार्यक्रम में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा कि जो लोग आरक्षण का लाभ पाकर आगे बढ़ गए हैं, उन्हें अपने वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण का त्याग करने के बारे में सोचना चाहिए।

Author October 8, 2018 5:45 AM
आज आरक्षण के नाम पर आंदोलन देखने को मिलते हैं। इन आंदोलनों से न सिर्फ समाज में ऊंच-नीच की भावना पैदा होती है, बल्कि हमारी युवा पीढ़ी इनसे सबसे ज्यादा प्रभावित होती है।

आरक्षण पर मंथन

हाल ही में रांची के एक कार्यक्रम में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा कि जो लोग आरक्षण का लाभ पाकर आगे बढ़ गए हैं, उन्हें अपने वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण का त्याग करने के बारे में सोचना चाहिए। दरअसल, आजादी के बाद शिक्षा और सरकारी नौकरियों में सभी को समानता देने के लिए जातिगत आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। लेकिन आज कितने ही सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के बच्चों को आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है। उन्हें आरक्षण देने का कोई तर्क नहीं बनता। उनके अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी और ऊंची से ऊंची शिक्षा दिलाने में सक्षम हैं। उनका बच्चा किसी भी कोचिंग संस्थान में जाकर सरकारी नौकरी की तैयारी कर सकता है। लिहाजा, ऐसे लोगों को बिना किसी सरकारी आदेश का इंतजार किए आरक्षण का त्याग करने की पहल खुद से शुरू करनी चाहिए। उन्हें अपने बच्चों को समझाना चाहिए कि अगर मेहनत के रास्ते पर निरंतर अग्रसर रहेंगे तो बिना आरक्षण का लाभ उठाए भी मंजिल तक पहुंचा जा सकता है। जब तक सरकार की तरफ से आरक्षण की समीक्षा नहीं जाएगी तब तक समाज ऐसे ही भ्रमित होता रहेगा और लोगों में असंतोष की भावना पैदा होती रहेगी। इसी का नतीजा है कि आज आरक्षण के नाम पर आंदोलन देखने को मिलते हैं। इन आंदोलनों से न सिर्फ समाज में ऊंच-नीच की भावना पैदा होती है, बल्कि हमारी युवा पीढ़ी इनसे सबसे ज्यादा प्रभावित होती है।

रोहित यादव, एमडी यूनिवर्सिटी, रोहतक

असुरक्षित सफर

दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने छेड़छाड़ से बचने के लिए अपने जीवन को संकट में डाल दिया और चलती बस से कूद गई। दिल्ली परिवहन निगम के बस रूट नंबर 544 पर कुछ शोहदे इसलिए सफर करते हैं कि उससे गार्गी और कमला नेहरू कॉलेज की छात्राएं आती-जाती हैं। ये दोनों ही दिल्ली विश्वविद्यालय के महिला कॉलेज हैं। इस घटना से पहले भी शोहदे उस छात्रा का अनेक बार उत्पीड़न कर चुके थे। उनमें से एक आरोपी ने उसका कई बार पीछा भी किया था।‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और ‘महिला सुरक्षा’ जैसे नारे लगातार कठघरे में खड़े नजर आते हैं। यदि एक लड़की इस दुनिया में आ भी जाती है तो जीवन भर उसकी गर्दन पर भिन्न प्रकार की तलवारें लटकी रहती हैं। दिल्ली में सफर के दौरान छात्राओं और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार को ऐसे रूटों पर महिला और विश्वविद्यालयों की छत्राओं के लिए विशेष बसें फिर से चलानी चाहिए। इनमें क्लस्टर बसों को भी शामिल करना चाहिए। दिल्ली नागरिक सुरक्षा (दिल्ली सिविल डिफेंस) के कर्मचारी और यात्री भी इस तरह की घटनाओं के मूक दर्शक बने रहते हैं। हमारी चुप्पी ही अपराधियों को दुस्साहसी बनाती है।

मोहम्मद आसिफ, जामिया मिल्लिया, दिल्ली

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