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चौपालः जमीनी हकीकत

इन दिनों देश में कांग्रेस द्वारा घोषित न्यूनतम आय योजना की चर्चा जोरों पर है। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा है कि अगर उनकी पार्टी केंद्र की सत्ता में आती है तो महीने में 12000 रुपए से कम आय वाले परिवारों को सालाना 72 हजार रुपए यानी हर महीने छह हजार रुपए तक की आर्थिक मदद दी जाएगी।

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इन दिनों देश में कांग्रेस द्वारा घोषित न्यूनतम आय योजना की चर्चा जोरों पर है। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा है कि अगर उनकी पार्टी केंद्र की सत्ता में आती है तो महीने में 12000 रुपए से कम आय वाले परिवारों को सालाना 72 हजार रुपए यानी हर महीने छह हजार रुपए तक की आर्थिक मदद दी जाएगी। चुनावी दिनों में राजनीतिक पार्टियां नई-नई लोकलुभावन योजनाएं लाती हैं। ये योजनाएं कितनी व्यावहारिक हैं इसकी जांच मतदाताओं को अवश्य करनी चाहिए। हमारे देश में लकड़वाला समिति से लेकर रंगराजन समिति तक ने गरीबी रेखा तय करने के लिए अपनी-अपनी सिफारिशें दी थीं।

रंगराजन समिति के हिसाब से भारत में 29.5 प्रतिशत लोग गरीब हैं यानी हर दस लोगों में से तीन गरीब हैं। ऐसा व्यक्ति, जो गांवों में रहता है और उसकी प्रतिदिन आय 32 रुपए से कम है उसे गरीब माना गया है। वहीं शहरों में 47 रुपए प्रतिदिन आय वाले को गरीब कहा गया है। लेकिन यह पैमाना अवास्तविक और अव्यावहारिक है क्योंकि एक मजदूर की मजदूरी 300 से 350 रुपए रोज है तो उस हिसाब से वह गरीब की श्रेणी में नहीं आता। जब तक सरकार गरीबी मापने की कोई ठोस विधि नहीं बनाएगी तब तक न्यूनतम आय योजना सही मायने में अमल में नहीं लाई जा सकती है। ऐसा इसलिए कि कई लोग फर्जी तरीके से अपनी मासिक आय 12000 रुपए से कम दिखा सकते हैं और इस योजना का लाभ भविष्य में अवैध तरीके से ले सकते हैं। जमीनी हकीकत यही है कि हमारे देश में योजनाओं का लाभ जरूरतमदों तक पहुंचता ही नहीं है।

न्यूनतम आय योजना पर जोर देने के बजाय कोई अच्छी कौशल योजना लाने पर बल देना चाहिए ताकि लोगों के भीतर कौशल के साथ-साथ आत्मविश्वास का संचार हो और वे अपने परिश्रम से हुई आय से आत्मसम्मान भरी जिंदगी जिएं। लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च से वित्तीय संकट गहराता है जिससे सरकार को कर बढ़ाने पड़ते हैं। इन करों का बोझ मध्यवर्ग पर पड़ता है जिससे उसकी जिंदगी और भी कठिन हो जाती है।
’निशांत महेश त्रिपाठी, कोंढाली, महाराष्ट्र

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