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चौपालः शिक्षा की सूरत

सही मायने में देखा जाए तो कक्षा एक से पांच तक के विद्यालय को चलाने के लिए प्राथमिक विद्यालयों में छह शिक्षक, एक क्लर्क और एक चपरासी, यानी आठ कर्मचारी होने चाहिए। तभी शिक्षा में गुणवत्ता संभव है। ऐसा होने से रोजगार में भी बहार आएगी। लेकिन हकीकत इसके उलट है।

Author Updated: February 12, 2020 2:57 AM
समान शिक्षा के अभाव में आर्थिक रूप से विपन्न लोग अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के मुकाबला कर सकते हैं क्या?

देश और खासकर उत्तर प्रदेश के सरकारी विद्यालयों की हालत अत्यंत जर्जर हो गई है। प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ पूरी तरह से ध्वस्त होती चली जा रही है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि कक्षा एक से पांच तक के एक विद्यालय को चलाने के लिए एक से दो शिक्षक नियुक्त हैं। चुनाव नजदीक आते ही सरकारें बार-बार शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने का प्रलोभन देती हैं। प्रश्न उठता है कि सरकार कब अंग्रेजी शिक्षा, मॉडल स्कूल बनाने और उम्दा शिक्षा देने का सपना साकार करेगी? सरकारें कभी इस ज्वलंत सवाल का जवाब नहीं देती हैं कि एक-दो शिक्षकों के सहारे कैसे प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा गुणवत्ता सुधरेगी!

सही मायने में देखा जाए तो कक्षा एक से पांच तक के विद्यालय को चलाने के लिए प्राथमिक विद्यालयों में छह शिक्षक, एक क्लर्क और एक चपरासी, यानी आठ कर्मचारी होने चाहिए। तभी शिक्षा में गुणवत्ता संभव है। ऐसा होने से रोजगार में भी बहार आएगी। लेकिन हकीकत इसके उलट है।  स्कूलों में तैनात शिक्षकों औपचारिकता निभा रहे हैं। वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए नजदीकी बड़े शहरों में रह कर आते-जाते हैं या फिर कभी विद्यालय जाते भी हैं तो कभी बस जाकर हस्ताक्षर कर वक्त पूरा कर लौट आते हैं।

ऐसे शिक्षक गरीब परिवारों से आने वाले नौनिहाल बच्चों का भविष्य चौपट कर रहे हैं। जो सरकार में बैठे शिक्षा के रखवाले हैं, वे क्या कर रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। अब नया शिक्षा सत्र शुरू होने वाला है, लेकिन शिक्षकों की भारी कमी है। सरकार को योग्य युवाओं की भर्ती करके शिक्षकों की कमी को दूर करना चाहिए।

’अभिनंदन भाई पटेल, लखनऊ
आरक्षण का पक्ष
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सर्वमान्य होता है, लेकिन जब मामला एकपक्षीय लगे, तब सवाल उठेंगे। समान शिक्षा, समान अवसर, जनसंख्या की हिसाब से देश की संसाधनों पर सबकी बराबरी की बात क्यों नहीं कोई करता? शिक्षा को मौलिक अधिकार का कितना पालन हो रहा है? समान शिक्षा के अभाव में आर्थिक रूप से विपन्न लोग अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के मुकाबला कर सकते हैं क्या? न्यायाधीशों की नियुक्तियों में देश में कुछ खास घराने लंबे समय से बने हुए हैं। यह किस मौलिक अधिकार के तहत है?

सदियों से इस देश रहने वाले मेहनतकश की दशा और बिगड़ती जा रही है। इसके लिए कौन जिम्मेवार है? दलितों में से कई जाति आज भी खुले हाथों से नाला, कचरा और गंदगी की सफाई करते हैं तो रईसजादे चम्मच, कांटे से खाना खाते हैं कि कहीं हाथ न धोना पड़ जाए। क्या यह सब किसी को नहीं दिखता? नौकरियों में आबादी के अनुपात में किसकी कितनी भागीदारी है, क्या यह भेदभाव नहीं दिखता?

प्रतिभावान कोई मां के गर्भ से नहीं होता। समुचित वातावरण, समुचित शिक्षा मिले तब घर-घर में ज्योति राव फुले और सावित्री बाई हो सकती हैं। धर्म की रोटी सेंकते-सेंकते सरकार गरीबों को नष्ट करने पर तुली हुई है और कुछ बहुजन भक्तों को लग रहा है कि उसे विशेष उपाधि मिल जाएगी। इस दुर्दशा के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?
’प्रसिद्ध यादव, बाबूचक, पटना

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