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चौपाल: शिक्षक का काम

एक तरफ तो हमारी सरकार स्कूली बच्चों की शिक्षा के लिए अपनी चिंता जाहिर करती है, उसके लिए कई सारे प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाती है। दूसरी ओर इन कामों को करने वाले शिक्षकों को स्कूल के अतिरिक्त अन्य कामों में लगा रखा गया है।

Author November 1, 2018 4:37 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

चुनावी समय चल रहा है और इसकी चर्चा जोरों पर है कि कौन-सी सरकार आएगी, क्या नए वादे होंगे, क्या नया एजेंडा होगा। यहां तक तो ठीक है। मगर इसमें स्कूल के शिक्षकों की ड्यूटी लगा देना विचित्र लगता है। कुछ शिक्षक तो महीनों से स्कूल नहीं गए है और वे बीएलओ के काम में लगे हैं। कई स्कूल में एक या दो शिक्षक ही शेष हैं और वे पहली से आठवीं तक का स्कूल देख रहे हैं। हालांकि यह चिंता उन्होंने कई मंचों पर साझा की है, मगर नतीजा सबके सामने है।

एक तरफ तो हमारी सरकार स्कूली बच्चों की शिक्षा के लिए अपनी चिंता जाहिर करती है, उसके लिए कई सारे प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाती है। दूसरी ओर इन कामों को करने वाले शिक्षकों को स्कूल के अतिरिक्त अन्य कामों में लगा रखा गया है। इससे शिक्षण कार्य प्रभावित हो रहा है। अपने शिक्षक को नहीं पाकर कुछ बच्चे स्कूल भी नहीं आते हैं। चिंता बस इतनी है कि हम अपने सरकारी स्कूलों के साथ करना क्या चाहते हैं! हम एक समय में दो बातें कैसे कर सकते हैं। यानी हमारी इच्छा ही नहीं है कि हमारे सरकारी स्कूलों की दशा सुधरे! क्या इस तरह के कामों के लिए कुछ और व्यवस्था नहीं हो सकती और शिक्षकों को उनके मुख्य काम यानी पढ़ाने में ही लगाया जाए?
’प्रेरणा, भोपाल

विकास के बरक्स
भारत के राजनेता अपने वादों में चाहे कितने ही बड़े-बड़े दावे कर लें, लेकिन सच्चाई यह कि भारत की स्थिति दिनोंदिन नीचे की ओर जा रही है। हाल ही में विश्व बैंक ने मानव विकास सूचंकाक की एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें 189 देशों में भारत 130 वें पायदान पर है। इस सूचंकाक में सिंगापुर पहले स्थान पर है। सूचंकाक के मुताबिक भारत द्वारा स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों की अनदेखी की गई है, जबकि यही क्षेत्र मानव विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। इससे भारत की स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती दिख रही है। जरूरत है वादों से ऊपर उठ कर जमीनी स्तर पर काम करने की, जिससे लड़खड़ाती हुई स्थिति संभल सके।
’वर्षा यादव, गाजियाबाद

धुंध की चादर
राजधानी दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। धुंध के कारण आंखों में जलन, गले में दर्द से लोग परेशान हैं। प्रदूषण को कम करने के लिए कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि दिवाली पर केवल दो घंटे तक ही पटाखे छोड़ सकेंगे। अब एक और फैसले के तहत प्रदूषण के स्तर को कम करने की कोशिश हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 15 साल पुराने पेट्रोल और 10 साल पुराने डीजल वाहनों के परिचालन पर प्रतिबंध लगते हुए परिवहन विभाग को निर्देश दिया है कि ऐसे वाहनों को सड़कों पर न उतरने दें।
’सुनाक्षी, दिल्ली विश्वविद्यालय

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