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चौपाल: पटाखों का समय

हमारे देश में त्योहारों में ही नहीं, बल्कि क्रिकेट मैच और चुनाव जीतने आदि मौकों पर भी पटाखे छोड़ने का रिवाज है, उनका क्या होगा! क्या हमारी पुलिस के पास इतने सिपाही हैं कि हर गली-मोहल्ले या घर में जाकर पटाखे फोड़ने की समय सीमा का उल्लंघन रोक सकें?

Author October 26, 2018 6:08 AM
पिछले साल अदालत ने पटाखों को लेकर सख्ती दिखाई थी

कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया है बल्कि उन्हें फोड़ने-छोड़ने का समय निर्धारित कर दिया है। शाम आठ बजे से दस बजे तक दिवाली और शादी-ब्याह में। क्रिसमस और नए साल पर रात 11 बजकर 55 मिनट से साढ़े 12 बजे तक। ऊपर से लग रहा है कि सर्वोच्च अदालत ने प्रतिबंध नहीं लगाया गया है मगर यह प्रतिबंध से कम भी नहीं है। अब इस साल हरे पटाखे और कम धुएं व केमिकल मिश्रण वाले पटाखे कहां से आएंगे? उनका तो उत्पादन ही नहीं हुआ है। अगले साल उत्पादन शुरू हो भी जाता है तो उनकी कीमत इतनी ज्यादा होगी कि वे आम लोगों की पहुंच में ही नहीं आएंगे।

दूसरी बात, हमारे देश में त्योहारों में ही नहीं, बल्कि क्रिकेट मैच और चुनाव जीतने आदि मौकों पर भी पटाखे छोड़ने का रिवाज है, उनका क्या होगा! क्या हमारी पुलिस के पास इतने सिपाही हैं कि हर गली-मोहल्ले या घर में जाकर पटाखे फोड़ने की समय सीमा का उल्लंघन रोक सकें? सेहत को और भी अनेक चीजों से नुकसान पहुंचता है। उन पर भी प्रतिबंध कोई लगाएगा?
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, झारखंड

फिर हादसा
हाल ही में दशहरे पर अमृतसर में बहुत दर्दनाक रेल हादसा हुआ जिसमें 60 से ज्यादा व्यक्तियों की मौत हुई थी। उस हादसे से सबक न लेते हुए पश्चिम बंगाल के हावड़ा स्टेशन की पटरी पर तीन रेलगाड़ियां एक साथ आने की खबर से अफरा-तफरी मच गई जिसमें एक व्यक्ति की मौत और कई व्यक्तियों के घायल होने की खबर आई। सवाल है कि पिछले दो सालों में कई रेल हादसों से भी रेल मंत्रालय ने सबक क्यों नहीं लिया? आज भारतीय रेलगाड़ियों में सफर करना यात्रियों के लिए सुरक्षित नहीं रह गया है। पिछले साल उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, खतौली और आंध्रप्रदेश के रेल हादसों में अनेक व्यक्तियों ने अपनी जान गंवाई। भारतीय रेलवे की सबसे तेज ट्रेन की रफ्तार 150 किलोमीटर प्रति घंटा है और औसतन 80 किलोमीटर प्रति घंटा रफ्तार होने के बावजूद यहां रेल हादसे या रेलगाड़ियों के पटरी से उतरने की खबरें चिंताजनक हैं। प्रधानमंत्री देश में बुलेट ट्रेन लाने की बात कह रहे हैं लेकिन ऐसी घटनाओं को देखते हुए इसका भारत में सफल हो पाना संदेह के घेरे में है। भारत विश्व में तीसरे और एशिया में सबसे बड़े रेल नेटवर्क वाला देश है लेकिन बढ़ते हादसों ने हमारे रेलवे की कार्यकुशलता पर उंगली उठाने का अवसर दिया है।
’अखिल सिंघल, नई दिल्ली

विश्वसनीयता पर प्रश्न
देश की सबसे बड़ी जांच एजंसी सीबीआइ में हो रही उठापटक से न सिर्फ उसकी लग रहे हैं बल्कि सरकार की भूमिका को भी संदेह की नजर से देखा जा रहा है। पिछले एक वर्ष से आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी रहा लेकिन सरकार ने इस पर त्वरित संज्ञान नहीं लिया। अगर समय रहते मामले को सुलझा लिया जाता तो मौजूदा अप्रिय स्थिति से बच सकता था। वैसे ही सीबीआइ की जांच प्रक्रिया कछुआ चाल से चलती है और अब इस गतिरोध से लंबित मुकदमों और जांच प्रक्रिया पर विपरीत असर ही पड़ेगा। देश की इस बड़ी जांच संस्था में हो रहा विवाद देश के लिए कतई शुभ संकेत नहीं है। कुछ साल पहले चुनाव आयोग में भी इससे मिलता-जुलता विवाद उत्पन्न हुआ था जिसकी परिणति एक साथ तीन आयुक्त बना कर हुई थी। बहुत संभव है कि सीबीआइ में भी इसी बहुआयुक्त नीति को अपनाया जाए।
’सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, दिल्ली

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