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चौपाल: नाकामी पर परदा

दरअसल, किसी प्रदेश के निवासियों के खिलाफ रोष भड़काने की घटनाएं हमेशा प्रायोजित होती हैं। ये तब और भी गंभीर रूप ले लेती हैं, जब आर्थिक तंगी का घोर रूप सामने आ जाए।

Author October 10, 2018 5:06 AM
मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने दावा किया कि पिछले 48 घंटे में कोई अप्रिय घटना नहीं हुई है और पुलिस ने स्थिति पर काबू पा लिया है।

भारत में महिलाओं को निशाना बना कर होने वाली हिंसा में बलात्कार का चौथा स्थान है। 2015 की राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात में बलात्कार के 1743 मामले दर्ज किए गए थे, जो उस वक्त बिहार के आंकड़ों से अधिक थे। भारत में महिलाओं के प्रति उदारता केवल किताबों में दर्ज है और उसका असल चेहरा बहुत ही विकृत है। किताबों में ही नारी को देवी बताया जाता है, पर असल में इसी नारी को कलंकिनी, कुलक्छिनी, डायन आदि न जाने क्या-क्या कहा जाता है। गौर करने वाली बात है कि हमारे समाज में ज्यादातर गालियों में नारी पर ही हमला होता है।

अन्य किसी भी अपराध की तरह बलात्कार है और इसके लिए दंड का प्रावधान है। किसी भी सूरत में लोगों की भावना आदि के उद्वेलन के नाम पर बदले की सामूहिक कार्रवाई को सही नहीं ठहराया जा सकता। क्या कुछ गुजरातियों द्वारा देश के पैसे लेकर भाग जाने पर हम सारे गुजरातियों को चोर कह सकते हैं? नहीं। इस तरह से सोचना भी असल समस्या से मुंह मोड़ना है। बलात्कार करने का आरोपी व्यक्ति बिहार का है। इसलिए बिहार के लोगों पर गुस्सा उतारने वाले कथित ‘गुजराती समुदाय’ को जवाब देना चाहिए कि बलात्कार की अन्य घटनाओं को लेकर वे चुप क्यों रहे। इन मामलों में बहुत से ऐसे भी हो सकते हैं जिनमें दुष्कर्म गुजराती मर्दों ने बिहारी मजदूरों की पत्नियों और बेटियों से किए हों। इन स्वनामधन्य समाज-सेवकों की संवेदना अब तक कहां सो रही थी?

दरअसल, किसी प्रदेश के निवासियों के खिलाफ रोष भड़काने की घटनाएं हमेशा प्रायोजित होती हैं। ये तब और भी गंभीर रूप ले लेती हैं, जब आर्थिक तंगी का घोर रूप सामने आ जाए। ‘गुजराती समुदाय’ के नाम पर हो रही इस कार्रवाई को जरूरी नहीं कि हर गुजराती का समर्थन प्राप्त हो, लेकिन यह जो हो रहा है उससे लगता है कि यह कोई गुजराती बनाम बिहारी का मामला है। दो बनावटी अस्मिताओं की आड़ में यह जो नफरत पैदा की जा रही है, उसका असल कारण उन लोगों की असफलताएं हैं, जिन्हें स्वर्ग का भ्रम बनाए रखना है। बलात्कार या किसी भी हिंसा की आड़ में दूसरे प्रदेश, संप्रदाय, जाति या अन्य अस्मिता वाले लोगों पर हमला हमारी शिक्षा, राजनीति और अर्थतंत्र की सामूहिक विफलता की ओर संकेत करता है। इस तरह की घटनाओं का एक इतिहास है। इसके देश और दुनिया में ढेरों प्रमाण हैं।
’रवि मानसी, जेएनयू, नई दिल्ली

अस्वच्छ दिल्ली
दिल्ली नगर निगम के सफाई कर्मचारियों की हड़ताल काफी दिनों से चल रही है, जिससे आम लोगों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। खबरों के मुताबिक केंद्र सरकार ने सफाई के मद में पैसा दे दिया है, लेकिन पता नहीं वह कहां गया! आज गली-मोहल्लों के जो हालात हैं वे नरक से कम नहीं हैं। गलियां इतनी गंदी हो गई हैं कि सांस लेना भी दूभर हो गया है। यह सोच कर शर्म आती है कि कोई बाहर से आएगा तो क्या सोचेगा! भारत में स्वच्छता के नारे दिए जाते हैं, तो इतनी गंदगी क्यों है? बीमारियां फैल रही हैं, जिसकी वजह कूड़े के ढेर हैं। उनसे इतनी बदबू आती है कि वहां से गुजरना मुश्किल होता है। सरकार को जल्द से जल्द स्वच्छता बहाल करने की जरूरत है।
’शादमा मुस्कान, दिल्ली

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