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चौपालः शिक्षा की उपेक्षा

किसी भी भारतीय संस्थान या विश्वविद्यालय को क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2018 में दुनिया के शीर्ष 150 संस्थानों में जगह नहीं मिलना बेहद चिंताजनक है।

Author June 17, 2017 3:57 AM
(File Photo)

किसी भी भारतीय संस्थान या विश्वविद्यालय को क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2018 में दुनिया के शीर्ष 150 संस्थानों में जगह नहीं मिलना बेहद चिंताजनक है। आजादी के 70 साल बाद भी भारत में 74 फीसद आबादी ही साक्षर है। 20 फीसद बच्चे प्राथमिक और 36 फीसद बच्चे माध्यमिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाते हैं। ‘राइट टू एजुकेशन फोरम’ के अनुसार शिक्षकों के पांच लाख से अधिक पद रिक्त हैं जबकि 6.6 लाख शिक्षकों को प्रशिक्षण की आवश्यकता है। भारत में आज भी 76 फीसद विद्यार्थी बारहवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। कड़वी हकीकत है कि भारत के विश्वविद्यालय से पढ़ने वाले विद्यार्थियों के पास डिग्री तो होती है लेकिन काम का हुनर नहीं होता है।

जहां विश्व के पहले विश्वविद्यालय तक्षशिला की स्थापना हुई थी और नालंदा जैसे सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय मौजूद थे, आज उसी देश का एक भी विश्वविद्यालय दुनिया के 150 विश्वविद्यालयों में जगह नहीं बना पाता है। यह विचार करने वाली बात है कि बजट का 3.5 फीसद हिस्सा ही शिक्षा पर खर्च होता है जबकि 1968 में कोठारी आयोग ने इसे बढ़ाकर छह फीसद करने की सिफारिश की थी। नई शिक्षा नीति व सुब्रह्मण्यम कमेटी की रिपोर्ट साल भर से मंत्रालय में धूल फांक रही है। सवाल है कि वर्तमान सरकार नई शिक्षा नीति लागू करने के लिए संतोषजनक कदम क्यों नहीं उठा रही है?

हमारी मौजूदा शिक्षा पद्धति न तो रोजगारपरक है और न नैतिक मूल्यों का पाठ पढ़ाने वाली है। आज जब दुनिया विश्व ग्राम के इस दौर में किताबों से निकल कर मोबाईल और कंप्यूटर में समाती जा रही है, हमारे देश के विद्यार्थी बस्ते के बर्बर बोझ तले दबे हैं। स्मार्ट इंडिया, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया जैसे अभियान तभी सफल हो सकते हैं जब शैक्षणिक संस्थाओं के पाठ्यक्रमों में व्यापक सुधार किए जाएंगे तथा शिक्षा रोजगारन्मुखी हो। जरूरत है कि जिस तरह हमारी सरकार 6 से 14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा के लिए वचनबद्ध है, उसी तरह तीन से छह वर्ष के बच्चों की शिक्षा के लिए भी वचनबद्ध हो क्योंकि यह आयु जीवन को आकार देने वाली होती है। उनके लिए बाल केंद्रित शिक्षण की व्यवस्था की जा सकती है।
आज शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है। अंकों की अंधी दौड़ में ज्ञान के महत्त्व को नजरअंदाज किया जा रहा है। कॉलेज राजनीति के अखाड़ों में तब्दील हो रहे हैं। इन हालात में राष्ट्रीय स्तर पर नई शिक्षा नीति बनाने की महती आवश्यकता है। शिक्षा जैसे समवर्ती सूची के विषय पर केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को मिलजुल कर सोचना होगा तभी समस्या का हल निकल पाएगा। सरकार को शिक्षा पर बजट बढ़ाना होगा। कुकुरमुत्ते की तरह यत्र-तत्र-सर्वत्र खुल रहे प्राइवेट स्कूलों के लिए लाइसेंस व उनके शिक्षकों के लिए योग्यता का मापदंड अनिवार्य करना होगा। केवल शिक्षा को संवैधानिक अधिकार बना कर नीति निर्देशक तत्त्वों में जोड़ने से हालात नहीं बदलेंगे बल्कि मौजूदा नवीन परिस्थितियों के अनुसार शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन करने होंगे।
’देवेंद्रराज सुथार, जेएनवीयू, जोधपुर

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