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चौपाल: सुविधा के सेकुलर

आतंकियों द्वारा बर्बरतापूर्वक की गई हत्या आदि, ऐसी जघन्य घटनाएं हैं जो जाने क्यों हमारे बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों को तनिक भी विचलित नहीं कर पार्इं।

Author October 5, 2018 5:58 AM
तस्वीर का प्रयोग प्रतीक के तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

आतंकवादियों द्वारा श्रीनगर दूरदर्शन के पूर्व निदेशक और मेरे सहयोगी व मित्र रहे लस्सा कौल की उनके घर (बेमना) के बाहर की गई निर्मम हत्या या फिर अपनी जान बचाने के लिए चावल के ड्रम में छुपे बालकृष्ण गंजू की आतंकियों द्वारा बर्बरतापूर्वक की गई हत्या आदि, ऐसी जघन्य घटनाएं हैं जो जाने क्यों हमारे बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों को तनिक भी विचलित नहीं कर पार्इं। कश्मीरी पंडितों के साथ हुई ऐसी अनेक हृदय-विदारक घटनाओं को इन बंधुओं ने एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया। इन घटनाओं पर कोई प्रतिक्रिया नहीं, प्रेस-क्लब में कोई विरोध-सभा नहीं, कोई कैंडल-मार्च नहीं, टीवी चैनल्स पर कोई बहस या चर्चा नहीं। विरोध स्वरूप-पुरस्कार/अवार्ड वापसी भी नहीं! कश्मीरी पंडित समुदाय को मीडिया के इस ‘द्वैत भाव’ की हमेशा खलिश/ नाराजगी रहेगी।

बालकृष्ण गंजू कश्मीर के दूरसंचार विभाग में काम करने वाले एक युवा इंजीनियर थे। उनकी 22 मार्च 1990 को आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। उन्हीं की याद में दिल्ली में बीएसएनएल कॉलोनी में पार्क बनाया गया है। जब इस पार्क और बालकृष्ण गंजू की मूर्ति के अनावरण के लिए आयोजकों ने तत्कालीन सत्ताधिकारियों से निवेदन किया तो कोई भी नेता, मंत्री अथवा समाज-सेवी इस काम के लिए राजी नहीं हुआ। शायद उनकी ‘धर्मनिरपेक्षता’ की छवि ऐसा करने से दांव पर लग जाती! तारीफ करनी पड़ेगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की, जो उस समय सांसद थे, उन्होंने आयोजकों के अनुरोध को स्वीकार किया और पार्क/मूर्ति का उद्घाटन/ अनावरण किया।
इस परिप्रेक्ष्य में यह सवाल पूछना वाजिब हो जाता है कि धर्मनिरपेक्षता का छद्म मुखौटा सही है अथवा पीड़ितों की भावनाओं की कद्रदानी?
’शिबन कृष्ण रैणा, अरावली विहार, अलवर

मैला सच
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिवस को स्वच्छता दिवस में तब्दील करना वाकई उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। इस काम में अगर-मगर तो होंगे, फिर भी कुछ सवालों को बगैर जवाब के छोड़ना ठीक नहीं है। विशाल होर्डिंग्स, एलईडी स्क्रींस और अखबारों के पन्नों पर बड़े-बड़े चेहरे झाड़ू लगाते देखे गए लेकिन गटर में मरने वाला हर बार किसी मलिन बस्ती का कोई टिमटिमाता चिराग ही होता है। सफाई के इस सियासी मिजाज से सब वाकिफ हैं।

सफाई तो हुई मगर कचरा कहां गया किसी ने नहीं देखा। गावों में फेंका गया या किसी गटर अथवा नदी के हवाले कर दिया गया? मुद्दा तो कचरे के सुरक्षित निस्तारण का है जहां सब खामोश हो जाते हैं। सफाई के इस मैले सच को बार-बार नजरअंदाज करना बेहद खतरनाक है। शहर साफ और बस्तियां गंदी! बापू का सपना ऐसा तो कतई नहीं था। साफ-सफाई का हक बेजुबान नदियों और मासूम गांवों को भी है। आखिर कब तक हमारे शहर शंघाई और नदियां नर्क बनती रहेंगी?
’एमके मिश्रा, माँ आनन्दमयीनागर, रांची

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