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चौपालः उम्मीद की किरण

आज राजनीति ऐसे मोड़ पर आ गई है जहां एक-दूसरे को अपशब्द कहना और उन्हें अपमानित करना जितना आसान और दुखद है वहीं प्रतिद्वंद्वी पार्टी के नेता का हालचाल पूछने जाना उतना ही दुर्लभ और सुखद लगता है।

राजनीतिक कटुता के ऐसे वातावरण के बीच तिरुवनंतपुरम से आई यह खबर सुकून देने वाली है कि केंद्रीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन अपनी धुर विरोधी पार्टी के नेता शशि थरूर का हाल जानने अस्पताल जा पहुंचीं।

सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में इन दिनों नेताओं द्वारा एक-दूसरे के प्रति बदजुबानी, कटु व्यवहार और चरित्र हनन की एक से बढ़ कर एक खबरें आए दिन मीडिया की सुर्खियां बन रही हैं। राजनीतिक कटुता के ऐसे वातावरण के बीच तिरुवनंतपुरम से आई यह खबर सुकून देने वाली है कि केंद्रीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन अपनी धुर विरोधी पार्टी के नेता शशि थरूर का हाल जानने अस्पताल जा पहुंचीं। उल्लेखनीय है कि लोकसभा चुनाव लड़ रहे शशि थरूर चुनाव प्रचार के दौरान एक मंदिर में पूजा करने गए थे जहां सिर में गंभीर चोट लगने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। सीतारमन ने एन चुनाव के बीच दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर जिस मानवीय सरोकार का परिचय दिया है वह एक-दूसरे पर गाली-गलौज और कीचड़ उछालने की राजनीति कर रहे नेताओं के लिए किसी सबक से कम नहीं है जिसकी आज देश की राजनीति को सर्वाधिक आवश्यकता है।

आज राजनीति ऐसे मोड़ पर आ गई है जहां एक-दूसरे को अपशब्द कहना और उन्हें अपमानित करना जितना आसान और दुखद है वहीं प्रतिद्वंद्वी पार्टी के नेता का हालचाल पूछने जाना उतना ही दुर्लभ और सुखद लगता है। एक समय था जब राजनीति सिद्धांत, मुद्दों और विचारधारा पर आधारित होती थी जिसमें आपसी द्वेष के लिए कोई स्थान नहीं था। नेता आपस में वैचारिक मतभेद रखते थे लेकिन उनमें मनभेद नहीं होता था। मगर आज की राजनीति में येन केन प्रकारेण चुनाव जीतने के लिए एक-दूसरे पर चोट करना आम बात है। जो दूसरे को जितनी ज्यादा चोट पहुंचा सके वह उतना बड़ा चुनावी सूरमा माना जाने लगा है।

आज की राजनीति में कहा जाता है कि विरोधियों को वार करने का कोई मौका न दें। मौका मिलते ही विरोधियों पर प्रहार करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी जाती। आरोप-प्रत्यारोप, परस्पर नीचा दिखाने की कवायद, चरित्र हनन की कोशिश और बदजुबानी के बीच आज के नेता स्त्री-पुरुष के बीच परस्पर संवाद की गरिमा और मर्यादा को भी भूलते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के रामपुर लोकसभा चुनाव क्षेत्र के सपा उम्मीदवार द्वारा अपनी प्रतिद्वंद्वी भाजपा प्रत्याशी के लिए इस्तेमाल की गई शब्दावली इस पतन की पराकाष्ठा है। ऐसे में प्रश्न उठना लाजमी है कि क्या भारतीय राजनीति मानवीय संवेदनाएं खो चुकी हैं? क्या एक ही मकसद (जनसेवा) के लिए राजनीति में आए नेतागण अपने को एक-दूसरे का जानी दुश्मन मानने लगे हैं? क्या नेताओं में सामान्य शिष्टाचार और बोलचाल की गरिमा का बोध भी शेष नहीं बचा है?

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद चुनाव आयोग द्वारा नेताओं की बदजुबानी के खिलाफ उठाए गए कदम स्वागतयोग्य हैं। लेकिन याद रखा जाना चाहिए कि कानून से हर समस्या का समाधान संभव नहीं है। खासतौर से मनुष्य के आचार-व्यवहार से जुड़े मामलों की समझ किसी कानूनी डंडे के बजाय स्वत: संज्ञान से अपने भीतर से विकसित हो तभी समाज के बर्ताव में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।
’देवेंद्र जोशी, महेश नगर, उज्जैन

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