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चौपाल: बजट की दिशा

किसी सरकार की दृष्टि को समझने के लिए तीन चीजों की जरूरत होती है- राष्ट्रपति का अभिभाषण, आर्थिक सर्वे और साल का आम बजट। लेकिन अगर सरकार को वास्तव में समझना चाहते हैं तो उसके कार्यों की गति देखना चाहिए

Author Published on: February 17, 2020 1:14 AM
भारत का आम बजट (फोटो सोर्स: फाइनेंशियल एक्सप्रेस)

मौजूदा सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा आम बजट लोकसभा में पेश किया गया, जिसमें न तो मंदी से उबरने और न तो रोजगार जैसे मुद्दों पर बात की गई। बस वही पुराने पैमाने पर महिमामंडन देखा गया। जैसे बजट इतिहास का सबसे लंबा भाषण, बजट को बजट न कह कर ‘बही-खाता’ कहना आदि। बजट की सबसे प्रमुख बात यह रही कि आयकर की दरों को आगे-पीछे कर दिया गया है।

किसी सरकार की दृष्टि को समझने के लिए तीन चीजों की जरूरत होती है- राष्ट्रपति का अभिभाषण, आर्थिक सर्वे और साल का आम बजट। लेकिन अगर सरकार को वास्तव में समझना चाहते हैं तो उसके कार्यों की गति देखना चाहिए और इसके लिए पिछले वित्त वर्ष का आम बजट को देख कर सरकार से सवाल पूछना चाहिए कि क्या उसने उन सभी कार्यों को पूरा किया, जिनको कह कर उसने संसद से बजट पास करवाया था। वास्तव में हमें एक ऐसा विकल्प तलाशना होगा जिसमें सरकार को बजट पेश करने के एक दिन पहले अपने पुराने सभी एक साल का कार्य और उनका खर्चा संसद की पटल पर रखना चाहिए।

वित्त वर्ष 2020-21 के आम बजट में जनगणना विभाग के बजट में करीब सात सौ फीसद का इजाफा हुआ है। वित्त वर्ष 2019-20 में जनसंख्या, सर्वेक्षण एवं सांख्यिकी और भारत के महारजिस्ट्रार विभाग का कुल आबंटन 621.33 करोड़ रुपए था, जिसे 2020-21 के आम बजट में बढ़ा कर 4568 करोड़ रुपए कर दिया गया। इससे यह शंका और बढ़ जाती है कि सरकार देश में कहीं एनआरसी लागू करने का विचार तो नहीं बना रही है। इन सबके अलावा सरकार ने शिक्षा के लिए 99,300 करोड़ खर्च करने का अनुमान लगाया है। लेकिन 2019-20 (संशोधित) बजट में केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए कुल 8660 करोड़ रुपए आबंटित किए गए थे, जबकि इस बजट में 8054 करोड़ रुपए आबंटित किए गए हैं।
’संदीप कुमार, ईसीसी, प्रयागराज

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