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चौपालः ईवीएम की आड़

मजे की बात है कि ईवीएम पर भरोसा उन नेताओं को ही नहीं है जो खुद ईवीएम से निर्वाचित होकर आज सांसद, विधायक और कुछ तो मुख्यमंत्री बने घूम रहे हैं।

Author Published on: April 17, 2019 1:41 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटो)

ईवीएम पर भरोसा नहीं, ईवीएम के साथ छेड़छाड़ हो सकती है- ऐसे आरोपों-संदेहों का जिन्न चुनाव देख कर फिर बोतल से बाहर निकल आया है। मजे की बात है कि ईवीएम पर भरोसा उन नेताओं को ही नहीं है जो खुद ईवीएम से निर्वाचित होकर आज सांसद, विधायक और कुछ तो मुख्यमंत्री बने घूम रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 21 दलों द्वारा दी गई याचिका पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग को सभी विधानसभा क्षेत्रों में हर बूथ पर वीवीपैट से मिलान का आदेश दिया था जिस पर चुनाव आयोग का कहना था कि ऐसा करने से परिणाम आने में देरी होगी। इसे कोर्ट ने मान भी लिया और हर विधानसभा क्षेत्र में पांच बूथों पर आकस्मिक वीवीपैट (वोटर वेरिएबल पेपर आॅडिट ट्रोल) मिलान की बात कही। चुनाव आयोग ने भी इस पर अपनी सहमति दे दी है।

वैसे सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि उसे चुनाव आयोग पर कोई संदेह नहीं पर राजनीतिक दलों के संदेह का भी समाधान होना चाहिए। इसके लिए चुनाव आयोग ने 3 जून 2017 को ईवीएम हैक करने की खुली प्रतियोगिता भी रखी थी पर विडंबना देखिए जो चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे ईवीएम हैक हो सकती है, ईवीएम का प्रयोग ठीक नहीं, ईवीएम जिस देश में बनता है वह खुद उसका प्रयोग नहीं करता, ईवीएम में कोई भी बटन दबाओ वोट एक खास पार्टी को जा रहा है- ऐसे तर्क देने वालों में से कोई वहां मौजूद नहीं था। यहां तक कि दिल्ली विधानसभा में अमेजन से ‘डमी’ ईवीएम खरीद कर हैकिंग का नाटक दिखाने वाले आम आदमी पार्टी के उत्साही नेता भी वहां मौजूद नहीं थे। वहां तो कुछ ऐसे नेता हाजिर थे जिनकी पार्टी देश में अपने अंतिम सांसें गिन रही है पर वे भी यह कह कर मुकर गए कि वे आयोग के ‘ईवीएम हैकथॉन’ में भाग लेने नहीं आए बल्कि ईवीएम की कार्यप्रणाली देखने आए हैं! इससे बड़ा मजाक क्या होगा!
बहरहाल, जनता होशियार हो चुकी है। ईवीएम पर संदेह जताने वाले नेताओं के सुप्रीम कोर्ट जाने से कुछ दिन पहले ही सोशल मीडिया पर प्रथम चरण के चुनाव के पूर्व ही संदेश धड़ाधड़ भेजे जा रहे थे कि हारे तो ईवीएम हैक, ईवीएम से छेड़छाड़ है और जीते तो यह महागठबंधन की ताकत है! जनता भी अब समझ चुकी है कि कैसे नेता जगह, समय और लोग देख कर रंग बदल लेते हैं। जहां कुछ राज्यों में उनके लिए ईवीएम ठीक है, कुछ उपचुनाव और विधानसभा चुनाव में ईवीएम गंगा की तरह पवित्र निकली तो वहीं दूसरी ओर लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण का मतदान ही हुआ है तो ऐसा क्या हो गया कि अभी से उसको बदनाम करने लगे? क्या प्रथम चरण में ईवीएम का विरोध करने वाले नेताओं को हार का डर सताने लगा है?

कितना हास्यास्पद है कि जो लोग ईवीएम पर हल्ला मचा रहे हैं या मतपत्र से चुनाव की मांग कर रहे हैं और जो पार्टी इन सबकी अगुवाई कर इन दिनों पूरे देश को न्याय दिलाने का ढिंढोरा पीट रही है उसने कहीं भी न तो किसी चुनावी भाषण में और न अपने घोषणापत्र में मतपत्र से चुनाव करने की बात कही है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में चुनाव जीते तो किसी ने एक सवाल नहीं किया और ईवीएम पर न कोई शक जताया। लगता है, नेताओं ने आपस में ही नारा बना लिया है कि हार की जिम्मेदारी से बचना है तो ईवीएम पर हार का ठीकरा फोड़ना है!
’देवानंद राय, दिल्ली

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