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चौपालः कोरोना और वायरस

जाहिर है, चीन की अर्थव्यवस्था में सुस्ती का अर्थ वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर होना होगा। कुल मिला कर स्वास्थ्य के अलावा कोरोना वायरस के तमाम दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।

कोरोना वायरस से पूरी दुनिया में अब तक 43 हजार से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं।

चीन में कोरोना वायरस संक्रमण के चलते साढ़े पांच सौ से ज्यादा मौत और करीब 31000 लोगों में वायरस संक्रमण ‘पॉजिटिव’ मिलने के बाद वैश्विक स्तर पर कोरोना को लेकर बहुत गंभीर स्थिति पैदा हो गई है। कोरोना के असर से न केवल दुनिया भर में लोगों के स्वास्थ्य को लेकर खलबली मची हुई है, बल्कि दुनिया भर का बाजार भी इस वायरस संक्रमण के सामने आने के बाद लगातार गिरा है। और तो और कोरोना वायरस के कारण वैश्विक जीडीपी में 0.4 फीसदी गिरावट का अंदेशा भी जताया जा रहा है। चीन आज विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसका वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद यानी कि जीडीपी में 16.3 फीसदी योगदान है। जाहिर है, चीन की अर्थव्यवस्था में सुस्ती का अर्थ वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर होना होगा। कुल मिला कर स्वास्थ्य के अलावा कोरोना वायरस के तमाम दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस वैश्विक आपदा पर जल्द नियंत्रण कर लिया जाएगा।
’अमन सिंह, बरेली, उत्तर प्रदेश

गरीबी का दंश
देश में गरीबी हटाने के लिए वर्षों से चलाई जा रही योजनाओं पर वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम द्वारा हाल ही में जारी की गई एक रिपोर्ट प्रश्नचिह्न लगाती है। दुनिया के बयासी देशों में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा आदि बिंदुओं पर एक सर्वे के मुताबिक यह रिपोर्ट तैयार की गई है। इस रिपोर्ट में डेनमार्क को गरीबी उन्मूलन के मामले में सबसे उन्नत देश बताया गया है। डेनमार्क में जहां कोई परिवार दो पीढ़ियों के बाद गरीबी से उबर जाता है, वहीं भारत में किसी परिवार को गरीबी से उबारने में उसकी सात पीढ़ियां खप जाती हैं।

गरीबी हटाओ का नारा हमारे देश में साठ के दशक से चल रहा है। गरीबी उन्मूलन के लिए वर्षों से कई योजनाएं चल रही हैं। अगर इन योजनाओं का क्रियान्वयन पूरी निष्ठा के साथ उन लोगों के लिए किया जाता जो वास्तव में इसके हकदार हैं तो अवश्य ही लोगों की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आ सकता था।

नई-नई योजनाएं प्रारंभ करने के बजाय अगर पुरानी योजनाओं पर ही युक्तिसंगत ढंग से ध्यान केंद्रित किया जाए तो निश्चित ही गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की माली हालत बदली जा सकती है। कुछ परिवार भी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए इस श्रेणी में अपना नाम दर्ज करा लेते हैं, जबकि वे इस रेखा से ऊपर का या कई बार आर्थिक रूप से संतोषजनक स्थिति में रहते हैं। लोगों को भी मानसिकता बदलने की आवश्यकता है।
’ललित महालकरी, इंदौर

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