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चौपालः नफरत की राजनीति

देश के कई हिस्सों में नेताओं ने अपने स्वार्थ की खातिर हिंसाजनक और भड़काऊ भाषण और बयान दे रहे हैं और दिल्ली दंगों के पीछे यह एक बड़ा कारण रहा। ऐसे भड़काऊ बयान और भाषण देने वालों के खिलाफ के सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

यमुना का पानी साठ प्रतिशत तक साफ हो गया है।

जब लोकतांत्रिक राष्ट्र में राजनीतिक महत्त्वकाक्षाएं राष्ट्र हित से सर्वोपरि हो जाएं तो फिर लोकतंत्र का कमजोर होना स्वाभाविक है। नफरत की राजनीति से कोई राजनीतिक दल अपना भला सोचता है तो यह देश के हित में नहीं है। यह सच्चाई है कि आज वोट बैंक की राजनीति ने आपसी सौहार्द, भाईचारा एवं सहिष्णुता को तिलांजलि दे दी है। इसी का नतीजा है कि देश के कई हिस्सों में नेताओं ने अपने स्वार्थ की खातिर हिंसाजनक और भड़काऊ भाषण और बयान दे रहे हैं और दिल्ली दंगों के पीछे यह एक बड़ा कारण रहा। ऐसे भड़काऊ बयान और भाषण देने वालों के खिलाफ के सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों।
’अली खान, फतेहगढ़, जैसलमेर

तालिबान की हिंसा
अमेरिका और तालिबान का समझौता ट्रंप की चुनावी रणनीति का ही परिणाम है। हालांकि इसमें शांति व्यवस्था को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। तालिबान की हिंसक और कट्टर इस्लामी विचारधारा एक समझौते से बदल जाएगी, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। बल्कि हकीकत यह है कि तालिबान पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा खूंखार रूप में सामने आएघा। राष्ट्रपति ट्रंप खुद भारत दौरे के दौरान इस्लामी आंतकवाद का जिक्र कर चुके हैं। गौरतलब है, दो दशक पहले तालिबानी हुकूमत के दौरान अफगानिस्तान में जनता के अधिकारों को कुचल दिया गया था। चिंता का विषय यह है कि तालिबान पाकिस्तान की जिद में आकर भारत के खिलाफ काम न करने लगे।

अमेरिका अभी पूरी तरह से अमेरिकी सैनिकों की वापसी नहीं कर रहा है। इसमें साल भर लगेगा। साथ ही, ट्रंप ने तालिबान को धमकी भी दी है कि अगर उसने समझौते का पालन नहीं किया तो अमेरिका अफगानिस्तान में पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा सैनिक भेजेगा। बहरहाल इस पहल को संयुक्त राष्ट्र महासचिव भी शांति प्रयास के रुप में देख रहे हैं। लिहाजा तालिबान बैठने की जगह पाकर लेटने की व्यवस्था न करने लगे।
’भूपेंद्र सिंह रंगा, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय

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