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चौपालः होली का संदेश

मुगल सम्राट अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक अबुल फजल ने लिखा था कि बादशाह होली के त्योहार से बहुत पहले से ही विभिन्न आकारों की पिचकारियां एकत्र करने लगते थे। अकबर केवल अपने दरबारियों के साथ ही होली नहीं खेलते थे, बल्कि महल के बाहर के लोगों के साथ भी होली खेलते थे। यह वह दिन था जब एक आम आदमी भी भारत के बादशाह को रंग लगा सकता था।

चौपालः शिक्षा की चुनौतियां।

होली ऐसा उत्सव है जो सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे उपमहाद्वीप को अपने रंग में सराबोर करता है। हिंदुस्तान में जो त्योहार सही मायनों में गंगा-जमुनी तहजीब को व्यक्त करता है, वह होली ही है। यह केवल रंगों का त्योहार ही नहीं है, बल्कि स्वयं जीवन का जश्न है। हर त्योहार का एक गहरा संदेश होता है। मसलन, दीपावली अंधेरे और बुरी ताकतों को दूर करती है। जबकि होली हमारे जीवन को अनेक रंगों से भर देती है। यह दोस्ती और मनमुटाव दूर करने का त्योहार है। जब लोग एक दूसरे को गले लगाते हैं, कटुता और नाराजगी को भूल जाते हैं और फिर प्यार व मोहब्बत से शेष जीवन व्यतीत करने का वायदा करते हैं, तो इसे होली कहते हैं। सम्राट शाहजहां के शासनकाल में जब फ्रांसीसी यात्री बरनियर भारत आए थे, तो इतने सारे लोगों को होली खेलता हुआ देख उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ था। यही तो होली की सुंदरता है। यह सामाजिक भेदभाव को मिटा देती है और लोगों को एक दूसरे के करीब लाती है। वास्तविकता यह है कि रंग खेलने से एक दिन पहले जो होलिका दहन होता है, वह वास्तव में तमाम आपसी दुर्भावनाओं को जला कर राख कर देने का प्रतीक है। होली समतावाद का संदेश देती है। मुगल सम्राट अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक अबुल फजल ने लिखा था कि बादशाह होली के त्योहार से बहुत पहले से ही विभिन्न आकारों की पिचकारियां एकत्र करने लगते थे। अकबर केवल अपने दरबारियों के साथ ही होली नहीं खेलते थे, बल्कि महल के बाहर के लोगों के साथ भी होली खेलते थे। यह वह दिन था जब एक आम आदमी भी भारत के बादशाह को रंग लगा सकता था।

होली यह संदेश देती है कि संयम व हिम्मत के साथ व्यक्ति को हर रंग का सामना करना चाहिए, क्योंकि विभिन्न रंग जीवन की विभिन्न स्थितियों का प्रतिनिधत्व करते हैं। कुल मिला कर हम सभी लोगों को होली का पर्व बहुत ही शानदार ढंग से मनाना चाहिए लेकिन हमें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे इस रंग के महापर्व में भंग डलने का काम हो।
’अमन सिंह, बरेली

सड़क सुरक्षा और सवाल

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में लापरवाही से वाहन चलाने के कारण कई इलाकों में सड़क हादसों में जान-माल की हानि चिंता का विषय बनी हुई है। हालांकि पिछले कुछ सालों में सरकारों की ओर से कदम तो उठाए गए हैं, लेकिन हादसे थमने का नाम नहीं ले रहे। सड़क पर चलते हुए या गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात कर रहे लोगों की आए दिन दुर्घटना की खबरें पढ़ने को मिलती हैं। अधिकांश लोग वाहन चलाते समय चालक अपने मोबाइल को कान और कंधे के बीच दबा कर बातचीत करते हुए वाहन चलाते हैं। दूसरा बड़ा कारण शराब पीकर के वाहन चलाना है। ज्यादातर हादसे वाहन चालकों के नशे में होने की वजह से होते हैं।

ऐसा नहीं है कि सड़क हादसे रोके नहीं जा सकते। सड़के हादसों को रोकने के लिए यातायात पुलिस की सख्ती जरूरी है। यातायात नियमों का पालन कराना पुलिस की जिम्मेवारी है। जो लोग यातायात नियमों का उल्लंघन करते पाए जाएं, उन पर जुर्माना और दंडात्मक कार्रवाई हो। लेकिन व्यवहार में देखने में यह आता है कि साल में कुछ दिन जब सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जाता है तो पुलिस सक्रिय होती है, उसके बाद फिर अपने ढर्रे पर लौट आती है और वसूली में लग जाती है। सड़क सुरक्षा के लिए नियमित रूप से लोगों को जागरूक बनाने के अभियान चलने चाहिए, और यह काम सिर्फ पुलिस का ही नहीं है, समाज में भी हर स्तर पर इसे चलाए जाने की जरूरत है। शिक्षण संस्थाओं में यातायात नियमों की कार्यशाला का आयोजन कर चित्रकला, निबंध, कविता, नाटक आदि के जरिए बच्चों में जागरूकता लाई जा सकती है। सड़क हादसों का बड़ा कारण सड़कों पर गड्ढे भी होते हैं, खासतौर से बारिश के मौसम में। आवारा पशु भी सड़क हादसे का कारण बनते हैं। सड़कों के आसपास लगने वाली दुकानें और अतिक्रमण बड़ी समस्या के रूप में सामने हैं। ये ऐसी समस्याएं हैं जिनका समाधान स्थानीय प्रशासन को निकालना होता है। इसके लिए नागरिकों के समूह को प्रशासन पर दबाव बनाना चाहिए, ताकि प्रशासन सजग रहे।
’संजय वर्मा, मनावर, धार

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