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चौपाल: भविष्य की खातिर

बच्चे देश का भविष्य होते हैं और इन्हीं पर देश की सुरक्षा और प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में न सिर्फ सरकार, बल्कि समाज का भी यह दायित्व है कि वे बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाएं और उनके व्यक्तित्व निर्माण पर बल दें, ताकि वे आगे चल कर एक बेहतर भारत के निर्माण में सहयोग कर सकें।

Author October 11, 2018 6:03 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

एक ओर बिहार में छेड़खानी का विरोध करती लड़कियों को पीटा जाना तो दूसरी ओर राजस्थान जैसे राज्य में छह महीने की बच्ची से और गुजरात में चौदह माह की बच्ची से बलात्कार जैसी घटना का सामने आना क्या दर्शाता है? क्या हमारा समाज बच्चों का दुश्मन बनता चला जा रहा है? क्या वह इतना भी सक्षम नहीं रहा कि बच्चों को संरक्षण दे पाए? आखिर समाज में ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं? क्या सिर्फ कानूनों के माध्यम से इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है?

अगर इन समस्याओं की जड़ को देखा जाए तो इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि वर्तमान में जिस तरह की फिल्में और विज्ञापन प्रकाशित हो रहे हैं, उनमें अश्लीलता का प्रभाव काफी बढ़ गया है जो कहीं न कहीं समाज की मानसिकता पर नकारात्मक असर डाल रहा है और महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की घटनाओं को बढ़ा रहा है। दूसरी ओर युवा वर्ग में नशे की प्रवृत्ति को लेकर यह सोच भी बढ़ती चली जा रही है कि नशा कोई बुराई नहीं है, यह तो सिर्फ मनोरंजन है। इसने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। कुछ क्षेत्रों में बढ़ती लैंगिक असमानता और शिक्षा व्यवस्था में नैतिकता जैसे विषयों का अभाव भी ऐसे अपराधों के केंद्र में रहे हैं।

ऐसी घटनाओं से बच्चों में असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है और उनकी मानसिकता पर बहुत बुरा असर पड़ता है। साथ ही ऐसी घटनाएं न सिर्फ समाज की छवि खराब करती हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर देश की छवि भी धूमिल करती हैं। अगर ऐसी घटनाओं को रोकने पर विचार करें तो यहां बात सिर्फ कानून बनाने की नहीं है। अगर इन अपराधों पर कानून से ही अंकुश लगाया जा सकता, तो अभी तक समाज इन बुराइयों से पूरी तरह निकल चुका होता। हालांकि इसमें भी दो राय नहीं कि बेहतर कानूनों के होते हुए, कानूनों का प्रवर्तन करने वाली संस्थाएं कभी-कभी इनका पालन कराने में चूक रही हैं और न्यायालय में लंबित मामले भी कहीं न कहीं इंसाफ को बाधित करते हैं। बच्चे देश का भविष्य होते हैं और इन्हीं पर देश की सुरक्षा और प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में न सिर्फ सरकार, बल्कि समाज का भी यह दायित्व है कि वे बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाएं और उनके व्यक्तित्व निर्माण पर बल दें, ताकि वे आगे चल कर एक बेहतर भारत के निर्माण में सहयोग कर सकें।
’आकाश मलिक, मुरादाबाद

इंसाफ की आवाज
एक बार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बलात्कार और यौन-उत्पीड़न जैसे मामलों पर कहा था कि जब लोग ऐसी बातों पर खुल कर बोलने लगेंगे, तब ऐसी चीजें समाज में अपने आप खत्म होने लगेंगी। सोशल मीडिया ने ऐसे माहौल को बनाने में कारगर भूमिका निभाई है। खासकर हैशटैग ‘मी टू’ के द्वारा कई महिलाओं ने आपबीती को सबके सामने पेश किया जिसके बाद कई सारी आवाजें उनके साथ खड़ी हुई हैं। पहले ये बातें महज चारदिवारी तक सीमित रह जाती थीं। ऐसे में यह मुहिम पीड़ित महिलाओं के लिए न्याय की एक उम्मीद बन कर आई है। वहीं अपराध अगर भूतकाल में किया गया हो तो इसका मतलब यह नहीं कि वह वर्तमान में अपराध की श्रेणी में न आए। अपेक्षा यही की जानी चाहिए कि हमारे समाज में ऐसी चीजें न हों। मगर जब तक इन पर खुल कर बात नहीं होती और दोषियों को सजा नहीं मिलती तब तक इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आने वाला।
’अजय कुमार, कैथल, हरियाणा

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