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चौपाल: दोहरा पैमाना

आखिर कौन-सी ऐसी मजबूरी है जिसके कारण प्रमुख राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ खड़े दिखते हैं। एक तरफ तो सत्तापक्ष को मुसलिम महिलाओं की बहुत चिंता होती है। वह उन्हें अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देता है।

Author November 1, 2018 4:20 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

वर्तमान में देश की राजनीति इस कदर रसातल को पहुंच चुकी है कि यहां के राजनीतिक दल किसी मुद्दे पर अपनी राय जनहित को ध्यान में रखते हुए कायम नहीं रखते हैं, बल्कि वोटहित को ध्यान में रखते हैं। पिछले कुछ महीनों में ही तीन तलाक के मुद्दे पर सत्ता पक्ष यह कहते हुए अपनी पीठ ठोंक रहा था कि वह मुसलिम महिलाओं के लिए न्याय के प्रति प्रतिबद्ध है। यह स्वागतयोग्य था। तब कांग्रेस समेत कुछ विपक्षी दल इस पर सहमत नहीं थे।

लेकिन अब जब केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति दे दी है तो भाजपा और कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ हैं और आंदोलन कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश को अनुमति देने वाले आदेश को वापस लिया जाए। जबकि केरल की कम्युनिस्ट पार्टी वाली राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करवाने पर जोर दे रही है। एक बात साफ है कि वास्तव में महिलाओं के हितों से किसी भी दल को कोई विशेष मतलब नहीं है।

मैं मंगलुरू (कर्नाटक) में केरल की सीमा के पास ही रहता हूं। मेरे विद्यालय में कई ऐसे साथी शिक्षक केरल से हैं। इतने पढ़े-लिखे होने और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े होने के बावजूद वे सबरीमला में महिलाओं के प्रवेश को गैरवाजिब मान रहे हैं। मुझे ताज्जुब हुआ कि एक पढ़ा-लिखा समुदाय भी एक सीधी-सी बात को क्यों नहीं समझ पा रहा है कि भगवान केवल पुरुषों के लिए ही नहीं है, बल्कि उसके समक्ष सभी एक समान हैं। अगर वह सबको बराबर मानता है तो क्यों न स्त्रियों को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जाए! यही नहीं, विरोध प्रदर्शन करने वालों में कुछ औरतें भी आगे हैं।

आखिर कौन-सी ऐसी मजबूरी है जिसके कारण प्रमुख राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ खड़े दिखते हैं। एक तरफ तो सत्तापक्ष को मुसलिम महिलाओं की बहुत चिंता होती है। वह उन्हें अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देता है। लेकिन दूसरी तरफ हिंदू महिलाओं के अधिकार की जब बात आती है तो वह अपने कदम पीछे खींच लेता है और परंपरा की दुहाई देने लगता है। अगर यही होता रहा तो भारत की प्रगतिशील विचारों वाली छवि को धक्का पहुंचेगा। साथ ही हम विश्व समुदाय के समक्ष सदियों से चली आ रही कुरीतियों और परंपराओं को मानने वाले देश के रूप में पहचाने जाएंगे।
’जीतेंद्र प्रताप, जवाहर नवोदय विद्यालय, मंगलुरू

निंदा की कसौटी
पिट्सबर्ग यहूदी इबादतगाह में हुई गोलीबारी में ग्यारह लोग मारे गए। मारने वाला छियालीस वर्षीय रॉबर्ट बोवेर्स को पकड़ लिया गया। कहा जा रहा है वह धुर-दक्षिणपंथी विचारधारा का है। इस घटना की जितनी भी निंदा की जाए, वह कम होगी। मैं देख रहा था कि इस वारदात के बाद करीब करीब पूरा पश्चिमी देश एक स्वर में इसकी निंदा करने लगे। यह जरूरी भी है। मगर क्या ऐसा सिर्फ खास समय पर ही किया जाना चाहिए?

क्या किसी खास वर्ग पर हुए हमले की ही निंदा करने का प्रचलन है? आए दिन इस्राइली सेना द्वारा फिलस्तीनियों को मारा जाता है। उस समय ये पश्चिम के देश कैसे चुप्पी साध लेते हैं, यह जानते हुए कि इस्राइल ज्यादती कर रहा है। फिलस्तीनियों का जमीन पर कब्जा करके उन्हें ही खानाबदोश जीवन जीने को बाध्य कर दिया गया है। इस पर भी तो यूरोप और अमेरिका को कुछ बोलना चाहिए! मगर नहीं बोलेंगे, क्योंकि इनके देशो में यहूदियों की अच्छी-खासी संख्या निवास करती है। इस तरह ‘मीठा-मीठा गिल और तीखा-तीखा थू’ वाला व्यवहार नहीं चलेगा।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

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