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चौपाल: रेल हादसे और सवाल

विशेषज्ञों के अनुसार गाड़ियों के अत्यधिक संख्या में परिचालन से पटरियां अत्यंत कमजोर और जर्जर होने, पटरियों को ठीक करने वाले ट्रैक मैनों और गैंग मैनों के पद समाप्त करके उनकी जगह ठेके के कर्मचारियों को इस काम पर लगाने से ये समस्या पैदा हुई है।

Author October 13, 2018 5:42 AM
सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले दस सालों में भारत में 1394 रेल हादसे हुए, जिसमें आधे से ज्यादे हादसे रेल कर्मचारियों की गलतियों से, ट्रेनों के पटरी से उतरने के कारण हुए।

एक और घटना के रूप में न्यू फरक्का एक्सप्रेस के हादसे की खबर ने फिर से कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सोच कर ही मन अवसादग्रस्त हो जाता है कि दुनिया में सबसे ज्यादा रेल हादसे भारत में ही क्यों होते हैं। ज्यादातर मामलों में रेलवे कर्मचारियों की लापरवाही, रेलवे लाइनों और रेल डिब्बों के पुराने और खस्ताहाल होने, रेल पटरियों पर ट्रेनों के अत्यधिक संचालन का दबाव के कारण उनके कमजोर होने से होते हैं। यह दुखद रेल हादसा भी रेलकर्मियों के लापरवाही से हुई है। समाचार पत्रों के अनुसार हरचंदपुर रेलवे स्टेशन पर गाड़ी को मेन लाईन पर सीधा निकल जाने का सिग्नल दिया गया, उसके बाद ट्रेन के ड्राइवर द्वारा ट्रेन की गति 110 किलोमीटर करने के बाद अचानक उसे एक लूप लाइन पर भेजे जाने की वजह से यह दुखद घटना हुई।

विशेषज्ञों के अनुसार गाड़ियों के अत्यधिक संख्या में परिचालन से पटरियां अत्यंत कमजोर और जर्जर होने, पटरियों को ठीक करने वाले ट्रैक मैनों और गैंग मैनों के पद समाप्त करके उनकी जगह ठेके के कर्मचारियों को इस काम पर लगाने से ये समस्या पैदा हुई है। दो लाख ट्रैक मैनों की खाली पदों को समाप्त कर दिया गया है। पटरियों की पुराने तरीके से ठीक से देखभाल न करके केवल खानापूर्ति की जा रही है। रेल हादसों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी का एक और कारण यह है कि सरकार और रेलवे पैसे की कमी का रोना रोकर टक्कर रोधी बोगियों और ऐसे सूचना यंत्रों को लगाने से अपना हाथ पीछे खींच लेता हैं जो इस तरह के हादसों से बचाने के लिए बनाए गए हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले दस सालों में भारत में 1394 रेल हादसे हुए, जिसमें आधे से ज्यादे हादसे रेल कर्मचारियों की गलतियों से, ट्रेनों के पटरी से उतरने के कारण हुए। पिछले तीस सालों में 2441 लोगों को भारतीय रेल उन्हें उनके गंतव्य स्थान और उनके परिजनों के पास न ले जाकर बीच रास्ते में ही रेल हादसों के जरिए ‘मार’ डाला! यह भारत महान का एक शर्मनाक विश्व रेकॉर्ड है। प्रश्न यह है कि रेल दुर्घटनाओं में मृतकों के परिजनों को मुआवजा न बांट कर उन्हीं पैसों से रेलों में सुरक्षात्मक उपकरण और टक्कर रोधी बोगियां क्यों नहीं लगाई जातीं? कभी ऐसा समाधान करने की कोशिश क्यों नही की जाती कि भविष्य में इस तरह की पुन: दुखद घटना ही न हो। क्या किसी के जीवन की कीमत की भरपाई मुआवजे से पूरी हो सकती है?
’निर्मल कुमार शर्मा ,गाजियाबाद

हिंदी बनाम गुजराती
देश के दूसरे राज्यों में, चाहे वे पश्चिमी भारतीय राज्य हों या फिर दक्षिणी राज्य, हिंदी भाषी लोगों का विरोध कोई नई बात नहीं है। इसका जीता जागता उदाहरण महाराष्ट्र बन चुका है जहां बिहार मूल के लोगों को इस पीड़ा का शिकार होना पड़ा था। अब आज यही घटना गुजरात में दोहराई जा रही है। गुजरात में एक अबोध बच्ची के साथ दुष्कर्म की घटना ने तनाव का माहौल बना दिया है। हालांकि सरकार ने सख्त कदम उठाए हैं। साढ़े चार सौ ज्यादा लोगों पर कार्रवाई की और सरकार के तरफ से आश्वासन भी दिया गया है। जिसने भी दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया है, उसे सजा जरूर मिलनी चाहिए। लेकिन सवाल है कि क्या एक व्यक्ति की गलती की सजा सारे हिंदी भाषी लोगों को चुकानी पड़ेगी? आज गुजरात में हिंदी बनाम गुजराती का माहौल बन चुका है जो देश की पहचान को आघात पहुंचा रहा है। अनेकता में एकता जो हमारी पहचान है, इतिहास गवाह है कि कैसे इसी पहचान के आधार पर देश का निर्माण हमारे नेताओं ने किया। क्या गुजरात की यही सुंदरता है जहां लोगों में भेदभाव किया जा रहा है? अगर गलती हुई है तो उसके लिए न्यायालय है सजा देने के लिए। क्या बिहार, उत्तर प्रदेश से जाने वालों की यही गलती है कि दो वक्त की रोटी के लिए रोजगार ढूंढ़ते दूसरे राज्य पहुंच जाते हैं? क्या यही गुजरात मॉडल है? जो हालात हैं उनमें समानता और अनेकता में एकता पर कायम रहने की जरूरत है।
’अभयजीत कुमार सिंह, दिल्ली

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