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चौपाल: संकट में जलवायु

जारी वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक के अनुसार भारत के कई शहर वायु गुणवत्ता मापन पर सबसे अधिक प्रदूषित पाए गए, जिसमें राजधानी दिल्ली, जयपुर और पुणे प्रमुख रहे।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

प्रदूषण की समस्या किसी एक व्यक्ति, एक समाज या एक देश की समस्या नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण विश्व के लिए चिंता का विषय है। इसलिए इन दिनों वैश्विक तापमान वृद्धि, जलवायु परिवर्तन, ओजोन परत की क्षति, तेजाबी वर्षा आदि मुद्दे विभिन्न मंचों पर बार-बार सुनाई देते हैं। इन्हीं के कारण जैव विविधता एवं परिस्थितिकी तंत्र पर कुप्रभाव पड़ रहा है। ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण समूची दुनिया के समक्ष कई खतरे उत्पन्न हो गए हैं। जो शंका सत्तर के दशक में ओजोन परत के बारे में पर्यावरण वैज्ञानिकों ने व्यक्त की थी, उसकी पुष्टि 1985 में ही अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र की खोज से हो गई थी। फलस्वरूप पर्यावरणविदों मे खलबली मची और विश्व के वैज्ञानिकों, नीति-निर्धारकों, स्वयंसेवी पर्यावरण संस्थाओं और संयुक्त राष्ट्र में ओजोन परत को बचाने के प्रयास शुरू किए गए।

16 सितंबर 1987 को पर्यावरण संकट के कारण मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर कई देशों ने सहमति व्यक्त की, जिसमें विषैली गैसों, जैसे क्लोरोफ्लोरो कार्बन, कार्बन टेट्रा क्लोराइड, मिथाइल क्लोरोफॉर्म आदि को एक निर्धारित अवधि में कम करने का उद्देश्य रखा रखा गया था। उल्लेखनीय है कि उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में पश्चिमी देशों ने जो औद्योगिक विकास हुआ, उसके दुष्परिणाम अभी तक हमें दिख रहे हैं और बची हुई कसर इक्कीसवीं सदी में बढ़ता औद्योगीकरण, परिवहन के अनियंत्रित साधन, प्राकृतिक संसाधनों के शोषण आदि के रूप में सभी देशों ने पूरी कर दी है। इसके कारण आज हवा में हमने जहर घोल दिया है। शिकागो यूनिवर्सिटी की ओर से हाल में जारी वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक के अनुसार भारत के कई शहर वायु गुणवत्ता मापन पर सबसे अधिक प्रदूषित पाए गए, जिसमें राजधानी दिल्ली, जयपुर और पुणे प्रमुख रहे।

आज हम जिस पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहे हैं, इसके पीछे प्रकृति को लेकर लोगों के दृष्टिकोण में आया परिवर्तन काफी हद तक जिम्मेदार है। जहां पहले प्रकृति को पूजा जाता था, आज प्रकृति का शोषण हो रहा है। पर्यावरणविदों का मानना है कि अगर वर्तमान हालात बदले नहीं गए तो पृथ्वी के औसत तापमान में चार डिग्री तक की वृद्धि हो सकती है और इसका परिणाम विभिन्न रूपों में देखने को मिलेगा । जैसे समुद्र का स्तर बढ़ना, जिसके कारण तटवर्ती क्षेत्रों का डूब जाना, जल चक्र में बदलाव, बाढ़ और सूखे की समस्या, चक्रवातों का आना, ताजे पानी और कृषि पैदावार में कमी। अगर हम आज भी जलवायु परिवर्तन या प्रदूषण की समस्या से निपटना चाहते हैं तो हमें पर्यावरणीय संस्कृति की तरफ लौटना होगा और लोगों को पर्यावरणीय मूल्यों के प्रति जागरूक करना होगा। स्कूल और विश्वविद्यलयों की व्यवस्था में पर्यावरण को पाठ्यक्रम में जोड़ कर प्रयोगात्मक स्वरूप प्रदान करना होगा। पर्यावरण को बचाने के लिए विश्व को जोरदार अभियान चलाने होंगे, अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए स्वच्छ पर्यावरण कि जगह ‘ऑक्सीजन किट’ छोड़कर जाएंगे।
’सौरभ कांत, दिल्ली

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