ताज़ा खबर
 

चौपालः सोच की सफाई

आम लोगों की अब भी यह आदत है कि केले का छिलका ,बेकार कागज, खाली बोतल या शीशी जैसी चीजें वहीं छोड़ देते हैं जिन्हें कूड़ा कहा जाता है। सोच यह है कि सफाई करने वाला कोई और है, वही यह काम करेगा! वे कूड़े को कूड़ेदान में डालने की भी जहमत नहीं उठाते।

Author July 12, 2019 2:13 AM
हमें सफाई को लेकर अपनी और समाज की सोच बदलनी होगी। हमारे देश में पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे पुरस्कार उन लोगों को भी दिए जाएं जिनका स्वच्छता में योगदान हो।

प्रधानमंत्री ने तकरीबन पांच साल पहले इंडिया गेट से आह्वान किया था कि देश को स्वच्छ बनाया जाए। इसके लिए स्वच्छ भारत अभियान तेजी से शुरू हुआ। नेता, व्यापारी और अधिकारी सब झाड़ू लेकर सड़क साफ करने उतरे। एक बात इसमें बहुत महत्त्वपूर्ण रही कि जो लोग इसे गंदा काम कहते थे, उनकी सोच में थोड़ा परिवर्तन आया। इस सबसे काफी उम्मीद बंधी। लेकिन जितना सोचा गया था गंदगी उतनी साफ नहीं हुई। वास्तव में गंदगी साफ न हो पाने का एक बड़ा कारण हमारी जाति व्यवस्था भी है। सैकड़ों जातियों में से जब एक ही जाति की जिम्मेदारी गंदगी की सफाई करने की मान ली गई हो तो यह संभव ही नहीं है कि देश को साफ-सुथरा रखा जा सके। गंदगी साफ करने वालों को अछूत और नीच समझा गया। और जब यह हुआ तो अन्य जातियों के लोग गंदगी साफ करने में अपमान और शर्म महसूस करने लगे।

इसी का नतीजा है कि अपने घर का कूड़ा सामने की सड़क और रास्ते पर ही फेंक दिया जाता है। आम लोगों की अब भी यह आदत है कि केले का छिलका ,बेकार कागज, खाली बोतल या शीशी जैसी चीजें वहीं छोड़ देते हैं जिन्हें कूड़ा कहा जाता है। सोच यह है कि सफाई करने वाला कोई और है, वही यह काम करेगा! वे कूड़े को कूड़ेदान में डालने की भी जहमत नहीं उठाते। दूसरी तरफ जापान जैसा देश है जहां बच्चे जब दोपहर का भोजन करते हैं तो न केवल अपने बर्तन साफ करते हैं बल्कि रसोईघर और फर्श भी साफ करते हैं। इस तरह यह कार्य उनके स्वभाव का एक हिस्सा बन जाता है और फिर इसे करने में अपमान महसूस करने का सवाल ही नहीं पैदा होता है।

हमें सफाई को लेकर अपनी और समाज की सोच बदलनी होगी। हमारे देश में पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे पुरस्कार उन लोगों को भी दिए जाएं जिनका स्वच्छता में योगदान हो। हम निराशावादी नहीं हैं लेकिन जो बात जाति व्यवस्था से जुड़ी है वह आशावादी बनने नहीं देती। निकट भविष्य में भी जाति व्यवस्था या जातीय सोच समाप्त होने वाली नहीं लगती। तो फिर यह मानसिकता कैसे खत्म होगी कि गंदगी साफ करना अपमान नहीं, सम्मान की बात है?दरअसल, इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब प्रशासनिक ही नहीं बल्कि सामाजिक और धार्मिक स्तर पर भी शुरुआत की जाए। स्वच्छ भारत अभियान भी तभी कामयाब हो सकेगा।
’अजीत कुमार गौतम, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App