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चौपाल: बचना बेहतर

आजकल के युवा पटाखे और आतिशबाजी आदि खरीदते समय उनसे होने वाले धमाके की तीव्रता और चमकीली रोशनी पर ध्यान देते हैं। पटाखों के रूप में हम पैसों की बर्बादी और अपनी तथा दूसरों की जान को जोखिम में डालने का पूरा-पूरा सामान खुशी-खुशी घर लाते हैं।

Author November 6, 2018 6:18 AM
प्रतीकात्मक फोटो

दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के बाद शगुन के रूप में फोड़े जाने वाले पटाखे अब हमारी ही मौत का सामान बनते जा रहे हैं। हवा में जहर घोलते ये पटाखे कई प्रकार की शारीरिक व मानसिक बीमारियों को जन्म दे रहे हैं। इनके धमाके हमारे चेहरे पर कुछ देर के लिए मुस्कान जरूर लाते हैं, पर यह मुस्कान हमारी बर्बादी का पूर्वाभास होती है। इसका अहसास हमें उस वक्त नहीं होता जब पटाखों की रोशनी में खो जाते हैं।

आजकल के युवा पटाखे और आतिशबाजी आदि खरीदते समय उनसे होने वाले धमाके की तीव्रता और चमकीली रोशनी पर ध्यान देते हैं। पटाखों के रूप में हम पैसों की बर्बादी और अपनी तथा दूसरों की जान को जोखिम में डालने का पूरा-पूरा सामान खुशी-खुशी घर लाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पटाखों के शौकीनों के लिए इस दिवाली पर बाजार में पर्यावरण के अनुकूल पटाखे भी आए हैं, जिनसे लोगों का शौक पूरा हो जाए और पर्यावरण को नुकसान भी न पहुंचे। वैसे दिवाली पर पटाखों और आतिशबाजी से बचना ही बेहतर है।
’सुशील वर्मा, गोरखपुर

संतुलन जरूरी
आजकल सोशल नेटवर्किंग साइट्स अधिकांश लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। शुरुआत में इन वेबसाइटों ने आपसी संबंधों को मजबूती दी, लेकिन कई मामलों में अब ये रिश्तों में तनाव का कारण भी बन गई हैं। रिश्तों की डोर प्रेम और विश्वास के धागे से बंधी होती है लेकिन इस डोर को इंटरनेट तेजी से कमजोर कर रहा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर अत्यधिक व्यस्तता के कारण जीवन साथी के प्रति परंपरागत सांस्कृतिक मूल्यों के निर्वाह और सम्मान में लगातार कमी आ रही है। इसके बढ़ते असर से हमारी संस्कृति भी प्रभावित हो रही है। सोशल मीडिया संचार का एक उत्तम माध्यम है, इसमें दो राय नहीं लेकिन यह रिश्तों की गुणवत्ता और प्रसन्नता को कम कर रहा है। इसके मद्देनजर जरूरी है कि अपने जीवन में संतुलन बना कर चलें। हम ध्यान रखें कि यह एक आभासी संसार है, वास्तविक नहीं। यदि हम इसे जरूरत से ज्यादा समय देंगे तो रिश्तों में दूरियां बढ़ेंगी।
’राजकुमार पांडेय, रायपुर, छत्तीसगढ़

पहले आत्ममंथन
आज गठबंधन की राजनीति भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की एक वास्तविकता है। भारत जैसे भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में किसी एक धारा के जरिए सभी विचारों को समेटना संभव नहीं है। यदि हम आजादी के आंदोलन को देखें तब भी अनेक विचारधाराएं अपने-अपने तरीके से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रही थीं। हालांकि आजादी के बाद लंबे समय तक देश में एक दल का शासन रहा लेकिन मंडल और कमंडल आने के बाद गठबंधन सरकारों का युग शुरू हुआ है। हालांकि जिन मुद्दों को लेकर प्रादेशिक ताकतें आगे बढ़ीं वे हाशिये पर चले गए और उस दौर में उभरे दल परिवारवाद और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं में ही उलझ गए। इसके परिणामस्वरूप 2014 के चुनाव में भाजपा की सरकार बनी। ऐसे में जब तक ये प्रादेशिक ताकतें आत्ममंथन नहीं करतीं तब तक इनके किसी गठबंधन या केंद्र में सरकार बनाने का विचार वास्तविकता नहीं बन सकता है।
’प्रशांत कुमार, ग्वालियर, मध्यप्रदेश

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