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चौपाल: प्रकाश की ओर

मनुष्य और पशु के बीच मूलभूत अंतर अंधकार से प्रकाश की यह यात्रा ही है। मनुष्य इसलिए मनुष्य है कि वह अपने परिष्कार का हर क्षण विचार करता रहता है। पशु इसलिए पशु है कि वह मनुष्य की तरह सोच नहीं पाता है। जब तक हम अंधकार से प्रकाश की यात्रा आरंभ नहीं करते हमारी पशुवत जड़ता बनी रहती है।

Author November 6, 2018 6:19 AM
दीपावली प्रकाश पर्व है क्योंकि मनुष्य का समूचा जीवन ही अंधकार से प्रकाश की यात्रा है।

दीपावली प्रकाश पर्व है क्योंकि मनुष्य का समूचा जीवन ही अंधकार से प्रकाश की यात्रा है। दीपावली तो उसके आत्मावलोकन की बानगी भर है। प्रकाश का मतलब जगमगाना और जीवन का मतलब जानना है। वेदांत का स्पष्ट मत है कि जीवन कुछ प्राप्त करने के लिए नहीं, कुछ जानने के लिए है। कुछ जानने अर्थात जिज्ञासु बने रहने का यह भाव ही प्रकाश पथ की ओर अग्रसर होना है। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ और ‘असतो मा सद्गमय’ की वैदिक प्रार्थना भी इसी ओर इशारा करती है।

अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा करने का यह गौरव सिर्फ मनुष्य को प्राप्त है। वैसे जब तक व्यक्ति अंधकार से घिरा है तब तक प्रकाश की ओर ले जाने वाला हर उपक्रम उसे अपना शत्रु लगता है। ईसा मसीह को सूली, मीरा को विष का प्याला, संत वैलेंटाइन को कारावास और महात्मा गांधी को गोली इसी अंधकार जनित मूढ़ता का नतीजा हैं। इतनी दूर क्यों जाएं! अपने बचपन में ही झांकें तो हम सबके जीवन में एक अवस्था ऐसी थी जब हमें अच्छाई की ओर अग्रसर करने वाली हर सीख दुश्मन नजर आती थी क्योंकि तब तक हमारी प्रकाश की यात्रा आरंभ नहीं हुई थी। जैसे ही हमने अंधकार से प्रकाश की यात्रा आरंभ की, हमारे ज्ञान के कपाट खुलने लगे। अच्छे और बुरे का भेद समझ आने लगा। इसीलिए प्रकाश को ज्ञान का और अंधकार को अज्ञान का प्रतीक माना जाता है।

मनुष्य और पशु के बीच मूलभूत अंतर अंधकार से प्रकाश की यह यात्रा ही है। मनुष्य इसलिए मनुष्य है कि वह अपने परिष्कार का हर क्षण विचार करता रहता है। पशु इसलिए पशु है कि वह मनुष्य की तरह सोच नहीं पाता है। जब तक हम अंधकार से प्रकाश की यात्रा आरंभ नहीं करते हमारी पशुवत जड़ता बनी रहती है। सारांश यह कि अंधकार से प्रकाश की यात्रा हो अथवा बदलाव की अन्य कोई प्रक्रिया, उसके लिए सबसे जरूरी है विचार करना। विचार प्रक्रिया आरंभ किए बिना किसी तरह के बदलाव की उम्मीद करना रेत में से पानी निकालने के समान है। जीवन लक्ष्य की तलाश में हमारा यह भटकाव ही हमारे अज्ञान का प्रतीक है। जीवन को पूर्ण मान कर उसे सही तरीके से जीने की समझ जिसे आ गई उसके लिए हर दिन दिवाली है। और मनुष्य जीवन मिलने के बाद भी जो उसे जीने के बजाय उसके लक्ष्य की तलाश में दर-दर भटक रहा है उसके जीवन में अभी दिवाली आना बाकी है। दीपावली का दीप अंधकार से प्रकाश की इस यात्रा का ही एक छोटा-सा उपक्रम है। यह साधन है साध्य नहीं। साध्य अंतर्मन में व्याप्त अज्ञान के अंधकार को दूर कर स्वयं को ज्ञान के प्रकाश की ओर प्रवृत्त करना है।
’देवेंद्र जोशी, महेश नगर, उज्जैन

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