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चौपाल: संकीर्णता का हासिल

दुर्भाग्यवश हमारी राजनीतिक पार्टियां ऐसे मुद्दों पर भी आरोप-प्रत्यारोप में उलझ कर वोट की राजनीति में व्यस्त हो जाती हैं। बताना तो पड़ेगा ही कि गुजरात सरकार ने उपद्रवियों को खुल कर खेलने क्यों दिया?

Author October 12, 2018 6:06 AM
गुजरात में जारी हिंसा के बाद वापस लौट रहे बिहार व यूपी के लोग (Photo: Video Grab)

भाषा और प्रांतीयता के आधार पर देश में हो रही हिंसक गतिविधियां हमारे समाज की पारस्परिकता की संस्कृति पर प्रहार हैं। गुजरात में उत्तर भारतीयों पर हमले और उन्हें पलायन के लिए धमकाने की खबरें चर्चा में हैं। यों उत्तर भारतीयोंं पर हमले का यह कोई पहला मामला नहीं है। महाराष्ट्र, असम जैसे राज्य इसकी मिसाल पेश कर चुके हैं। गुजरात में एक अबोध बालिका के साथ बलात्कार की घटना से निश्चय ही मानवता कलंकित हुई है और आरोपी को उसके कुकर्म की कठोरतम सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन एक अपराध की आड़ में संविधानसम्मत लोकतांत्रिक अधिकार को कुचल कर देश में अराजकता और अशांति को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।

दुर्भाग्यवश हमारी राजनीतिक पार्टियां ऐसे मुद्दों पर भी आरोप-प्रत्यारोप में उलझ कर वोट की राजनीति में व्यस्त हो जाती हैं। बताना तो पड़ेगा ही कि गुजरात सरकार ने उपद्रवियों को खुल कर खेलने क्यों दिया? बिहार सहित उत्तर भारतीय राज्यों की सरकारें विकास का ऐसा मॉडल क्यों तैयार नहीं कर पा रहीं कि वहां के लोगों को अपने राज्यों में ही रोजगार मिल सके? कामगारों को भगा कर क्या कोई राज्य विकास की गाथा गढ़ पाएगा? अपने ही देश में पराएपन का अहसास क्या सर्वथा अनुचित नहीं है? विविधताओं में एकता की हमारी पहचान कहीं खो न जाए, इसलिए हमें भाषावाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद जैसी संकीर्णताओं का दमन करना होगा।
’मंजर आलम, रामपुर डेहरु, बिहार

खानपान पर खतरा

हाल ही में हरियाणा के गुरुग्राम में नवरात्रि के नूतन अभियान में नगर निगम के लाइसेंसधारी मांस विक्रेताओं पर कहर ढाते हुए कुछ तथाकथित हिंदू संगठनों ने दुकानों को जबरन बंद करा दिया गया। राहत की घड़ी तब आई जब प्रशासन ने मौके पर पहुंच कर स्थिति पर नियंत्रण किया, अन्यथा अनहोनी होती तो फिर जान-माल की हानि भी हो सकती थी। आखिर ये संगठन कौन हैं, कहां से उन्हें खुराफात करने की खुराक मिलती है? देश के अमन-चैन को वे क्यों रक्तरंजित करना चाहते हैं? देश या राज्य चलाने वाले ‘जनसेवक’ ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर उन्हें जेल की हवा क्यों नहीं खिलाते?

ये कुछ बुनियादी सवाल हैं, जो मेरे जैसे शांतिप्रिय नागरिक को परेशान करते हैं। अगर किसी संगठन ने किसी के खाने-पीने पर अपनी दादागीरी से प्रतिबंध लगाया तो फिर कानून और संविधान की जरूरत क्या है? हालांकि मैं शुद्ध शाकाहारी हूं, लेकिन अगल-बगल मांसाहारी मित्रों और परिवार के साथ बैठ कर अपना भोजन करने में मुझे कोई कठिनाई नहीं दिखती है। अगर ऐसे उपद्रवियों को अपने स्वार्थ की सिद्धि में कहीं परदे के पीछे से बल मिल रहा है तो मेरा यही निवेदन है कि संसद से पुराने नियमों की समीक्षा कर नया प्रस्ताव पारित कर दिया जाए कि किसे क्या खाना है और क्या नहीं! इन शरारती तत्त्वों को याद रखना पड़ेगा कि भूतकाल में जिसने भी अपने आचरण से प्राकृतिक और सामाजिक नियमों के साथ खिलवाड़ किया, उसे आज तक समाज और देश ने क्षमा नहीं किया।
’अशोक कुमार, पटना

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