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चौपाल: पिछली नजीर

2010 में कांग्रेस-नीत गठबंधन ने इसे 235 करोड़ डॉलर में खरीदा, यानी मूल कीमत की अपेक्षा तीन गुना मूल्य में। जब इसका स्पष्टीकरण मांगा गया तो रक्षामंत्री एके एंटनी ने कहा कि खरीद समझौते में एक गोपनीयता धारा है, इस कारण उत्तर नहीं दिया जा सकता।

Author September 29, 2018 5:32 AM
INS विक्रमादित्‍य (FILE PHOTO)

राफेल पर लगातार शोर मचा रही कांग्रेस जरा आईएनएस विक्रमादित्य की खरीद का इतिहास भी जान ले, जो बहुत पुराना नहीं पड़ा है। यह विमानवाही पोत रूस से लिया गया। इसका पहला नाम एडमिरल गोर्शकोव था। वाजपेयी सरकार ने रूस से 2004 में इसका सौदा 80 करोड़ डॉलर में तय किया था। इसके बाद उनकी सरकार चली गई। 2010 में कांग्रेस-नीत गठबंधन ने इसे 235 करोड़ डॉलर में खरीदा, यानी मूल कीमत की अपेक्षा तीन गुना मूल्य में। जब इसका स्पष्टीकरण मांगा गया तो रक्षामंत्री एके एंटनी ने कहा कि खरीद समझौते में एक गोपनीयता धारा है, इस कारण उत्तर नहीं दिया जा सकता। बहुत सारे सूचनाधिकार कार्यकर्ता इस बारे में केंद्रीय सूचना आयुक्त (सीआइसी) पहुंचे, जिन्होंने सरकार को स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया। तब यूपीए सरकार सीआइसी के आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट गई और वहां से उसके खिलाफ निर्णय प्राप्त किया, लेकिन तीन गुना अधिक कीमत का रहस्य खोला नहीं। यह है गोपनीयता धारा की ताकत व उसका सम्मान।

एचएएल को राफेल का ‘ओफ्सेट पार्टनर’ नहीं बनाने को लेकर भी कांग्रेस की आपत्तियां निराधार हैं। यह सरकारी संस्थान, जिसने तेजस नामक स्वदेशी लड़ाकू विमान को बनाने में 25 साल ले लिए (और कैग के मुताबिक स्वदेशी के नाम पर 70 प्रतिशत विदेशी माल लगाया) और ध्रुव नामक युद्धक हेलिकॉप्टर के निर्माण को 20 वर्ष विलंबित कर दिया, किस मुंह से कांग्रेसी उसकी तरफदारी कर रहे हैं? एचएएल को लेकर मनीष तिवारी, नवीन जिंदल, सुरेश कलमाड़ी और शशि थरूर जैसे कांग्रेसी सांसदों ने 2012 में रक्षामंत्री एंटनी से शिकायत की थी। उसके बाद रक्षामंत्री ने खुद अपने मंत्रालय की संसदीय समिति के सम्मुख एचएएल की तीखी आलोचना कर उसे अधिक कार्य-कुशल बनने का उपदेश दिया था। आज इन्हीं नेताओं को वही अकुशल संस्थान याद आ रहा है!

’अजय मित्तल, मेरठ

इंसानियत से दूर
बार कुछ लोग ऐसी हरकत कर देते हैं जिससे लगता है कि वे जानवरों से भी बदतर कार्य करके मानव जाति के सबसे समझदार होने पर ही प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। पिछले दिनों जालंधर में दो नवजात लड़कियों को इधर-उधर फेंके जाने के समाचार सामने आए। अपने बच्चों को तो जानवर भी जान से ज्यादा प्यार करते हैं, फिर इंसान ऐसी हरकत क्यों कर रहा है? क्या लोगों के बीच इंसानियत बिल्कुल समाप्त हो चुकी है?

जिस देश में कन्या पूजन होता हो उस देश में नवजात बच्चियों को इधर-उधर फेंकना बहुत अफसोसनाक है। सरकारें लोगों को यह जागरूक करने के लिए ‘एक या दो ही बच्चे काफी’ जैसा अभियान चलाए हुए हैं, लेकिन उनके कानों पर जूं कहा रेंगती है! अंधविश्वास, परिवार नियोजन की जानकारी का अभाव और ‘ज्यादा बच्चे ज्यादा कमाई’ जैसी सोच के कारण कुछ लोग ज्यादा बच्चे पैदा करने के बारे में सोचते हैं। सरकार यह सब रोकने के लिए कई कानून बनाती है, लेकिन न कानून सख्ती से काम करता है और न लोग कानून का पालन करते हैं। समाज को चाहिए कि अगर आसपास का कोई भी ऐसी घटिया हरकत करे तो उसका बहिष्कार कर दे।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

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