ताज़ा खबर
 

चौपालः नागरिकता पर खर्च

असम में एनआरसी लागू किया गया था। लगभग तीन करोड़ की जनसंख्या में तकरीबन उन्नीस लाख लोग ऐसे पाए गए, जिनके पास भारतीय होने के कागजात नहीं हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इसमें असम में इस पर कुल खर्च लगभग बारह सौ बीस करोड़ रुपए हुआ।

Author Published on: December 26, 2019 2:30 AM
CAA, NRC के खिलाफ विरोध प्रदर्शन

बीते कुछ दिनों से देश में जगह-जगह पर नागरिकता कानून और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन को गैर संवैधानिक बता कर विरोध प्रदर्शन चल रहा है। सरकार का तर्क यह है कि ये कोई संविधान के खिलाफ नहीं, वहीं प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ये कानून संवैधानिक और सामाजिक तौर पर गलत है। गौरतलब है कि किसी कानून के तीन पहलू होते हैं। पहला कानूनी, दूसरा सामाजिक और तीसरा आर्थिक पहलू। देश में जगह-जगह पर पहला और दूसरा पक्ष नजर आ रहा है, लेकिन तीसरा यानी आर्थिक पक्ष विरोध के रूप में देखने को नहीं मिल रहा है।

हाल ही में असम में एनआरसी लागू किया गया था। लगभग तीन करोड़ की जनसंख्या में तकरीबन उन्नीस लाख लोग ऐसे पाए गए, जिनके पास भारतीय होने के कागजात नहीं हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इसमें असम में इस पर कुल खर्च लगभग बारह सौ बीस करोड़ रुपए हुआ। मतलब एक व्यक्ति पर एनआरसी का औसतन सरकारी खर्च चार सौ रुपए है। भारत की जनसंख्या लगभग एक सौ पच्चीस करोड़ है। अगर इसे पूरे भारत मे लागू किया जाता है तो कुल खर्च लगभग लगभग पचास हजार करोड़ होगा जो सरकारी कोष पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। क्या इस आर्थिक संकट के दौर में यह लागू करना सही होगा? क्या यह सही होगा जब भारत में बेरोजगारी दर शीर्ष पर है? क्या भारत में रहने वाले लोगों पर संसाधनों में कमी की जाएगी?

जिनके पास नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त कागजात नहीं है, उन्हें रखने लिए कई डिटेंशन सेंटर बनाए गए हैं, जिसमें फिलहाल सिर्फ तीन हजार लोग रह सकते हैं। क्या उन्नीस लाख लोगों को रखने से आर्थिक बोझ नहीं बढ़ेगा? किसी भी कानून का सिर्फ सामाजिक और कानूनी पक्ष के आधार पर समर्थन देना कहां तक सही है? किसी भी कानून का आर्थिक पक्ष सरकार को सामने रखना चाहिए, ताकि इससे सरकार पर बोझ न पड़े। यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत अभी एक गहन आर्थिक संकट से जूझ रहा है।
’विश्वजीत शुक्ला, सिंगरा खुर्द, झारखंड

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 चौपालः बदलता दौर
2 चौपालः मौसम का मिजाज
3 चौपाल: इंटरनेट पर पाबंदी
ये पढ़ा क्या?
X