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चौपालः ‘बढ़ती बीमारियां’ और ‘नदी का जीवन’

स्वास्थ्य को लेकर देश के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिस हिसाब से देश की आबादी साल-दर-साल बढ़ती गई है, उसके मुताबिक न तो मेडिकल कॉलेज और न ही डॉक्टरों की गिनती में इजाफा हुआ है।

Author June 11, 2018 5:36 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

बढ़ती बीमारियां

आजादी के सत्तर सालों के बाद भी देश के गरीबों के लिए रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाएं मिल पाना मुश्किल बना हुआ है। वहीं ‘बीमारी की मार से गरीबों की हालत उन्हें भयावह और दुखदायी स्थिति में लाकर खड़ी कर देती है। बीमारी के बाद गरीबों को दोतरफा मुसीबतें झेलनी पड़ती है। पहला, उन्हें अच्छी और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं का नहीं मिल पाना और दूसरा, महंगी दवाई की मार उनकी मुसीबतों को और बढ़ा देती है। देश में स्वास्थ्य सेवाओं का आलम यह है कि बीमारी के बाद गरीब तो क्या पैसे वाले भी प्राइवेट अस्पताल में प्रवेश करने से डरते हैं। गरीबों के पास तो सरकारी अस्पताल के सिवा और कोई दूसरा ठिकाना नहीं दिखता! सरकारी अस्पतालों की स्थिति इतनी बुरी है कि एक बिस्तर पर दो मरीजों को रखा जाता है और डॉक्टरों की मौजूदगी भी ‘भगवान भरोसे ही रहती है।

स्वास्थ्य को लेकर देश के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिस हिसाब से देश की आबादी साल-दर-साल बढ़ती गई है, उसके मुताबिक न तो मेडिकल कॉलेज और न ही डॉक्टरों की गिनती में इजाफा हुआ है। देश में जितने भी सरकारें आर्इं, सबने गरीबों के लिए न जाने कितनी स्वास्थ्य योजनाओं को अमली जामा पहनाने की कोशिश करते रहे, मगर हकीकत सरकार की नीतियों का पोल खोल कर रख देती है। एक ओर देश के विकास की गति में बढ़ोतरी का दावा किया जा रहा है, दूसरी ओर गरीबों की स्थिति में कोई बदलाव देखने को नहीं मिल पा रहा है। अगर सरकार सोच रही है कि हमारा देश भी दुनिया के शक्तिशाली देशों की गिनती में शुमार हो तो उसे जन स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को बेहतर और सस्ती बनानी पड़ेगी, क्योंकि कोई भी बीमार देश विकास की ‘रेसमें ज्यादा लंबे समय तक दौड़ नहीं सकेगी।

पियूष कुमार, नई दिल्ली

नदी का जीवन

जब हम छोटे बच्चे थे और अकसर पर्व-त्योहारों पर क्षिप्रा नदी में स्नान करने उज्जैन अपने दादा-दादी की अंगुली पकड़े जाते थे, तब क्षिप्रा नदी गरमी के समय में भी स्वच्छ और अथाह जल से लबालब भरी कलकल बहती रहती थी। उस समय नदी किनारे किसी भी घाट पर जाकर हम क्षिप्रा के निर्मल जल से अपनी प्यास बुझाते थे। लेकिन आज तीन-चार दशकों के बाद ही स्थिति खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है? बालपन में देखा सुंदर नजारा और आज एक गंदे बरसाती नाले के समान दिखाई देती क्षिप्रा नदी को देख कर बहुत अफसोस होता है। अब इसके पानी से प्यास बुझाना तो दूर, उसमें स्नान भी करना सुरक्षित नहीं रहा। लोग नदी किनारे बोतलबंद पानी खरीद कर पी रहे है।

सिर्फ क्षिप्रा ही नहीं, देश की अन्य कई नदियां अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही हैं। बढ़ते प्रदूषण, शहरीकरण और अवशिष्ट पदार्थों के इन नदियों में विसर्जन से नदियां खत्म होती जा रही हैं। गंगा और यमुना भी अपने उद्गम स्थान से निकलने के बाद मैदानी इलाकों में आते-आते ही प्रदूषण और गंदगी से मैली हो गई है। इससे बुरी स्थिति क्या होगी कि आज उत्तराखंड और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल शिमला के लोग भी जलसंकट का सामना कर रहे हैं। नदियों को लोगों ने आज अवशिष्ट पदार्थों और तमाम गंदगी को बहाने का एक साधन बना लिया है। नदियों के प्रदूषित होने की यही रफ्तार रही तो आने वाले वर्षों में नदी से वंचित मनुष्य का जीवन बहुत कष्टप्रद हो जाएगा। इसलिए समय रहते इन नदियों को बचाना होगा।

संजय डागा, इंदौर

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