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अनर्थनीति

पिछले दिनों यूनान के आर्थिक संकट की बहुत चर्चा हुई। महान सभ्यताओं वाला देश एक झटके में आर्थिक रूप से धराशायी हो गया।

पिछले दिनों यूनान के आर्थिक संकट की बहुत चर्चा हुई। महान सभ्यताओं वाला देश एक झटके में आर्थिक रूप से धराशायी हो गया। कारण के रूप में यूनान सरकार की शाहखर्ची सामने आई जो अपने नागरिकों को अधिक से अधिक सुख-सुविधाएं देने के लिए की गई। बैंक दिवालिया हो गए और यूरोपीय संघ ने देश पर खर्चों की कटौती के लिए कई कड़ी शर्तें लादने की बात कही।

इस घटना के बाद देश-दुनिया के आमजन की सहानुभूति यूनान के साथ जुड़ गई कि एक मुल्क अपने नागरिकों की भलाई के लिए कितना बड़ा जोखिम ले सकता है! हाल ही में वित्तीय संकटों के अध्येता माइकल लेविस ने अपनी किताब ‘बूमरैंग’ में इस ग्रीक त्रासदी के एक अन्य पहलू की ओर इशारा किया है। यह दूसरा पहलू झूठ, कुव्यवस्था और भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ है। किताब में दसवीं सदी के एक ग्रीक मठ की चर्चा मिलती है जिसके मठाधीश ने अधिकारियों के साथ मिलकर भारी गुल-गपाड़ा किया।

मठ के नियंत्रण में आने वाली ‘बिस्तोनिदा’ झील को सरकार के हवाले कर महंत ने बदले में 73 सरकारी परिसंपत्तियों को अपने हाथ में ले लिया। इनमें एथेंस ओलंपिक 2004 का जिम्नास्टिक स्टेडियम भी शामिल था। जल्द ही देश की इन संपत्तियों का भू-उपयोग बदलवा कर मठाधीश ने इसे वाणिज्यिक किया और निजी लाभ कमाने लगे। इसी किताब में एक बिल्डर का भी जिक्र है जिसने एथेंस शहर में कई इमारतें बनाकर बेच दीं और अपने रसूख और अधिकारियों के साथ घनिष्ठता के दम पर एक भी रुपए का कर देने से बच गया।

ग्रीक संकट के इन उदाहरणों को देख कर अब क्या हमें अपने देश की याद नहीं आती जहां बैंकों का तीन लाख करोड़ रुपए का ऋण डूबा हुआ है! दिलचस्प बात है कि इस ऋण का 40 प्रतिशत बड़े उद्योगपतियों का है जो अपनी पहुंच के बल पर कर्ज वापसी की ओर से निश्चिंत बैठे हैं।

भू-उपयोग बदल कर सरकारी खजाने को भारी चपत लगाने की इस यूनानी नजीर से क्या वाड्रा मामले की याद नहीं आती! वाड्रा, आदर्श घोटाले और आएदिन आशाराम और रामपाल जैसे तथाकथित महंतों द्वारा सरकारी कृपा से प्राप्त जमीन के मामले इस बात के संकेत हैं कि हमारे यहां भी दर्जनों यूनान छुपे बैठे हैं।

भारत यूनान जितना छोटा नहीं है इसलिए ऐसे कुछ मामलों से यहां की अर्थव्यवस्था पर आंच नहीं आती। पर यूनान के संकट से हम स्पष्ट तौर पर जान सकते हैं कि ऐसा ही चला तो कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था को भी एक बड़ी तबाही का सामना करना पड़ सकता है।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली

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