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चौपाल: चीन पर अंगुली

इसका जिक्र स्वयं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी कर चुके हैं कि यह कोरोना वायरस नहीं, बल्कि चीनी वायरस हैं। आखिर सत्ता की भूख और विश्व में महाशक्ति बनने की मंशा से शायद चीन की साम्यवादी सरकार ने इस वायरस को जैविक हथियार के रूप में इस्तेमाल तो नहीं किया?

Author Published on: April 1, 2020 3:19 AM
COVID-19: चीन में कोरोना वायरस के मामलों ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली है। (indian express)

तीन दिन पहले (29 मार्च) को गूगल टाइम्स के आधिकारिक अकाउंट पर ट्वीट किया गया है कि चीनी वैज्ञानिकों ने कोरोनोवायरस का मुकाबला करने के लिए एक नया हथियार विकसित किया है। वे कहते हैं कि उन्होंने एक नैनोमीटर बना लिया है जो 99.9 फीसद दक्षता के साथ वायरस को अवशोषित और निष्क्रिय कर सकता है। इस ट्वीट से कई शंकाए पैदा हो जाती हैं, क्योंकि जब वुहान से बीजिंग लगभग 1100 किलोमीटर और चीन की आर्थिक राजधानी शंघाई छह सौ किलोमीटर दूर हैं, वहां वायरस का प्रकोप इतना नहीं देखा गया, जितना कि हजारों किलोमीटर दूर इटली, ईरान, अमेरिका, स्पेन इत्यादि चीन के प्रतिद्वंदी देशों मे देखा गया है। और तो और, पिछले कुछ दिनों में चीन में बहुत ही कम नए मामले आए हैं और बयासी हजार के करीब संक्रमितों में से यकायक छिहत्तर हजार के करीब ठीक हो जाना भी आश्चर्य पैदा करने वाला है। क्योंकि इतना परिवर्तन तो यूरोपीय देशों में भी नहीं देखा गया, जबकि चिकित्सा और विज्ञान के मामले में यूरोपीय देश चीन से कहीं पीछे नहीं हैं। और अब चुपके से इस वायरस का तोड़ उजागर करना क्या चीन को इस वायरस के हमले की सोची समझी साजिश के दायरे में नहीं लाता?

इसका जिक्र स्वयं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी कर चुके हैं कि यह कोरोना वायरस नहीं, बल्कि चीनी वायरस हैं। आखिर सत्ता की भूख और विश्व में महाशक्ति बनने की मंशा से शायद चीन की साम्यवादी सरकार ने इस वायरस को जैविक हथियार के रूप में इस्तेमाल तो नहीं किया? जब पूरा विश्व बड़ी मंदी की गिरफ्त में है, तब चीन अपना औद्योगिकीकरण बढ़ा रहा है, चीन से विदेशी निवेशक जा रहे हैं और उनके शेयर को चीन कौड़ियों के भाव खरीद रहा है। ऐसा क्यों? इन सब प्रश्नो के उत्तर तो काल के गर्भ में हैं। लेकिन भारत को इन प्रश्नों से सबक लेकर चीनी निर्भरता को कम करना होगा और सरकार को कुछ ऐसे कदम उठाने होंगे जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र भारत बन सके।
’अमरसिंह सोढा, मूलाना (जैसलमेर)

अपने ही घर में
आज जब देश में इक्कीस दिन का पूर्ण बंद घोषित कर दिया गया है, तब देश के बड़े-बड़े शहरों से अपने गांवों की ओर पलायन करते गरीब-मजदूरों की मार्मिक तस्वीरें देख कर आंखें भर आती हैं। ऐसा लगता है कि मानो बंटवारे के समय के पलायन की कहानियां आखों के सामने ताजा हो गई हो। इस वक्त पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है। देश में पूर्ण बंदी के चलते कल-कारखाने बंद हुए, तो वहां काम कर रहे लाखों कामगारों को उनके फैक्ट्री व मकान मालिकों ने गांव लौट जाने का हुक्म फरमा दिया। ऐसे में इन मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया।

यह वह तबका है जो दिन-रात मेहनत करता है और वक्त आने पर अपने ही देश में दो जून की रोटी के लिए मोहताज हो जाता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हमारे हुक्मरानों की निगाह में भारत से पहले इंडिया होता है, फिर भारत। भारत को कोरोना से लड़ना है और इन गरीबों की भूख से भी। इंडिया ने उसे अपने घरों से बाहर सड़कों पर फेंक दिया है।
’आदित्य राव, कानपुर

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