चौपाल: ब्रह्मपुत्र का जीवन

हाल ही में चीन ने फिर भारत के साथ पैंतरा बदल कर अरुणाचल प्रदेश से सटे तिब्बत के सीमावर्ती जिले मितोंग में यारलुंग त्सांग्पो नदी, जो भारत में आकर ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है, पर एक बड़े हाइड्रो पावर बांध बनाने की शुरुआत कर दी है।

Assam
ब्रह्रमपुत्र नदी। फाइल फोटो।

इस बांध को बनाने के पीछे चीन का मकसद भारत को नुकसान पहुंचाना भी हो सकता है। चीन से निकली ब्रह्मपुत्र नदी अरुणाचल प्रदेश, असम होते हुए सैकड़ों किलोमीटर का सफर करते हुए बांग्लादेश तक बहती है। बहुत सारे लोग रोजगार जैसे मछलीपालन, कृषि आदि के लिए इसी पर निर्भर हैं।

चीन की मंशा बड़े बांध बना कर इसकी धारा को अपने क्षेत्रों में मोड़ कर भारत में सूखे की स्थिति निर्मित करना हो सकता है। अगर वह अपने मकसद में कामयाब हो जाता है तो निश्चित ही वह कभी बांध से अधिक पानी छोड़ कर बाढ़ की स्थिति निर्मित करेगा और कभी पानी को रोक कर सूखे की। असम में निर्मित कई जल विद्युत केंद्र पर बिजली उत्पादन पर असर पड़ने लगेगा। इस तरह वह आर्थिक मामलों में हमें कई तरह के नुकसान पहुंचाने लगेगा। भारत को इस दिशा में चीन से वार्ता कर अभी से स्थिति स्पष्ट करनी होगी। वरना आने वाले वर्षों में हम अपनी जीवनदायिनी ब्रह्मपुत्र नदी को खो चुके होंगे।
’संजय डागा, हातोद, मप्र

बेवजह विवाद

अगर धरती पर व्यक्ति के रूप में किसी को भगवान की संज्ञा दी जाती है तो वह है चिकित्सक यानी डॉक्टर, जो बीमारियों का इलाज कर लोगों का जीवन बचाते हैं। उनके इस कार्य को सबसे बड़ी सेवा के रूप में देखा जाता है। लेकिन जब यही चिकित्सक केवल मुनाफा कमाने के लिए काम करने लगें और निजी स्वार्थों के लिए समय-समय पर अपने कार्य को बंद कर हड़ताल करना शुरू कर दें, तो स्थिति बहुत विकट हो जाती है। उनकी हड़ताल के कारण इलाज से वंचित मरीजों के सामने जान बचाना एक बड़ी चुनौती हो जाती है। यानी एक तरफ डॉक्टर जान बचा कर भगवान का दर्जा हासिल करते हैं, दूसरी ओर उनकी वजह से जान जाने की नौबत खड़ी हो जाती है।

दरअसल, हाल ही में सरकार आयुर्वेदिक डॉक्टरों को प्रशिक्षण के बाद सामान्य आॅपरेशन करने की अनुमति देने के लिए नियम लेकर आई है। इससे सर्जरी या आॅपरेशन करने वाले डॉक्टरों की संख्या और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से गुणवत्ता बढ़ेगी। खर्च में कमी आएगी और सुदूर क्षेत्रों में भी ऐसे डॉक्टरों की उपलब्धता होगी।

इस नियम पर एलोपैथिक डॉक्टरों ने कड़ी आपत्ति जताई है और डॉक्टरों के एक समूह ने हड़ताल भी किया, जिस दौरान बहुत सारे मरीज इलाज से वंचित रहे। एलोपैथिक डॉक्टरों का कहना है कि शल्य चिकित्सा या आॅपरेशन का अधिकार केवल उन्हीं के पास होना चाहिए। जबकि यह स्वास्थ्य सेवाओं के विकास में एक अवरोधक की तरह की काम करेगा।

भारत दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देशो में से एक है, जिसमें चिकित्सा सेवाएं जनसंख्या अनुपात के अनुसार अभी तक उपलब्ध नहीं है। ऐसे में चिकित्सा सेवाओं का विकास और विस्तार किया जाना चाहिए। खासतौर पर महामारी का सामना करने के दौरान डॉक्टरों को हड़ताल करने के बजाय सहायक वर्गों का दायरा बढ़ाने में सहयोग करना चाहिए।
’सुनील कुमार सिंह, मोदीपुरम, मेरठ, उप्र

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