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चौपाल: संकट की शिक्षा

लंबे समय तक मोबाइल पर देखते रहने से आंखों की समस्या भी होने लगी है। यह डिजिटल डिवाइड और डिजिटल खाई का नतीजा ही है। यूनेस्को ने इस समस्या पर काबू पाने के लिए डिजिटल खाई को पाटने समेत छह-सूत्री उपाय सुझाए हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश के लिए इन सुझावों पर अमल कर पाना टेढ़ी खीर है। बहुत से शिक्षाविदों ने देश में डिजिटल खाई पर गहरी चिंता जताई है।

कोरोना काल में सबसे अधिक प्रभावित बच्चे हुए हैं। स्कूल-कॉलेज बंद होने से वे पढ़ नहीं पा रहे हैं। ऑनलाइन क्लासेज अव्यावहारिक साबित हो रहा है।

कोरोना महामारी ने देश के अनेक छात्रों को डिजिटल संकट में डाल दिया है। सभी छात्रों के पास इंटरनेट जैसी सुविधा न हो पाने से पढ़ी के मामले में डिजिटल खाई का बढ़ना चिंताजनक है। इस समय सरकारी कोशिशों के बाद भी देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्रों का डिजिटल विभाजन सामने आ रहा है। देश के अनेक गरीब स्कूलों को पता ही नहीं कि पूर्णबंदी जैसी स्थिति में वे अपने छात्रों को आॅनलाइन कैसे पढ़ाएं।

इस तस्वीर का दूसरा पहलू एकदम अलग है। मिसाल के तौर पर कोलकाता के एक प्रतिष्ठित स्कूल की ओर से हर सप्ताह आयोजित होने वाली बारह सौ आभासी कक्षाओं में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए रोजाना औसतन दस हजार छात्र दो घंटे पढ़ाई करते हैं। इस स्कूल ने बीते सप्ताह ही नौवीं और ग्यारहवीं के छात्रों की आनलाइन परीक्षा भी आयोजित की है।

प्रश्न यह है कि देश में आखिर कितने स्कूलों के पास ऐसी सुविधा है। खासकर ग्रामीण इलाकों में तो कंप्यूटर और इंटरनेट के साथ ही बिजली भी एक समस्या है। आर्थिक रूप से पिछड़े तबके के छात्रों तक आनलाइन पहुंचना बेहद गंभीर समस्या है। देश की राजधानी दिल्ली को ही लें। वहां सरकारी और नगरपालिका के स्कूलों में पढ़ने वाले कई बच्चे मोबाइल, इंटरनेट और कंप्यूटर के अभाव की वजह से आॅनलाइन कक्षाओं में शामिल नहीं हो पा रहे थे। आॅनलाइन पढ़ाई में छात्र भी ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। यही वजह है कि आॅनलाइन कक्षाओं से करीब आधे छात्र ही जुड़ पाए हैं।

इसके अलावा कहीं इंटरनेट की रफ्तार, तो कहीं संसाधनों की कमी आॅनलाइन पढ़ाई को प्रभावित कर रही है। आॅनलाइन कक्षाएं बेहतर तो हैं, लेकिन जो पाठ्य सामग्री भेजी जा रही है, उससे बेहतर सामग्री कई बार यू-ट्यूब पर उपलब्ध रहती है।

लंबे समय तक मोबाइल पर देखते रहने से आंखों की समस्या भी होने लगी है। यह डिजिटल डिवाइड और डिजिटल खाई का नतीजा ही है। यूनेस्को ने इस समस्या पर काबू पाने के लिए डिजिटल खाई को पाटने समेत छह-सूत्री उपाय सुझाए हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश के लिए इन सुझावों पर अमल कर पाना टेढ़ी खीर है। बहुत से शिक्षाविदों ने देश में डिजिटल खाई पर गहरी चिंता जताई है।

संयुक्त राष्ट्र के व्यापार मामलों के संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट में सचेत किया है कि डिजिटल तकनीक में अग्रणी और पीछे छूट रहे देशों के बीच चौड़ी होती खाई को अगर नहीं पाटा गया, तो वैश्विक असमानता का रूप बदतर हो जाएगा। मध्य आय वर्ग के परिवारों में भी सभी के पास ऐसी सुविधा नहीं है कि उनके बच्चे ठीक से आॅनलाइन माध्यम से पढ़ाई कर सकें। एक बड़ी समस्या बिजली की निर्बाध आपूर्ति की भी है।

इस संदर्भ में यह भी सोचा जाना चाहिए कि देश के सबसे अधिक साक्षर और संपन्न राज्यों में शुमार केरल में अगर डिजिटल विषमता की खाई भयानक है, तो पिछड़े राज्यों की हालत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

दिल्ली के 35 से अधिक कालेजों के 12214 छात्रों के बीच किए गए एक आॅनलाइन सर्वेक्षण में पाया गया था कि 85 प्रतिशत छात्र आॅनलाइन परीक्षाओं के खिलाफ थे, 75.6 प्रतिशत के पास उन कक्षाओं में भाग लेने या परीक्षाओं के लिए बैठने के लिए लैपटॉप नहीं था, जबकि 79.5 प्रतिशत के पास ब्रॉडबैंड नहीं था। लगभग 65 प्रतिशत ने कहा कि उनके पास अच्छा मोबाइल इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध नहीं है, जबकि लगभग 70 प्रतिशत ने दावा किया कि उनके घर आॅनलाइन परीक्षा देने के लिए अनुकूल नहीं थे।

ऐसे में डिजिटल खाई की मौजूदगी में शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरत को अगर पूरी तरह आॅनलाइन तकनीक पर निर्भर बना दिया जाएगा तो करोड़ों गरीब, निम्न व मध्य आय वर्गीय परिवारों के बच्चे पीछे छूट जाएंगे।
’आदित्यप्रियंशु सिंह, आजमगढ़(उप्र)

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