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चौपाल: गरीब का डर

इसमें सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना उन लोगों को करना पड़ रहा है जो रोज कमाने-खाने वाले हैं। जिनका न अपना कोई ठिकाना है। लाखों की संख्या में मजदूर बड़े शहरों में काम करने आते हैं। लेकिन जब काम ही नहीं होगा तो कहां जाएंगे, यह बड़ा सवाल है।

Author Published on: March 31, 2020 12:41 AM
गरीब कोरोना से पलायन करने काे मजबूर हैं।

आज इंसान की बुनियादी जरूरतों में भोजन, पानी, वस्त्र और मकान, पानी, बिजली,परिवहन सुविधा आदि शामिल हैं। आज दुनिया के किसी भी देश के नेतृत्व करने वाले कर्णधारों का यह प्रथम कर्तव्य बनता है कि वह अपने राज्य की समस्त जनता की इन जरूरतों को सतत बकरार रखने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध रहे और उसके अनुरूप कृत्य करे। परंतु हमारे देश में सत्ता के ये कर्णधार जनता के प्रति लापरवाह और असंवेदनशील होते जा रहे हैं। पहले नोटबंदी और अब दूसरी बार कोरोना से बचाव के लिए पूर्ण बंदी कर दी गई। इसमें कोई संदेह नहीं कि पूर्ण बंदी एक जरूरी कदम था और सभी को इसका पालन करना चाहिए। लेकिन जिस तरह से पूर्ण बंदी की गई, उससे साफ है कि यह कदम भी नोटबंदी की तरह ही बिना विचारे उठा लिया गया।

इसमें सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना उन लोगों को करना पड़ रहा है जो रोज कमाने-खाने वाले हैं। जिनका न अपना कोई ठिकाना है। लाखों की संख्या में मजदूर बड़े शहरों में काम करने आते हैं। लेकिन जब काम ही नहीं होगा तो कहां जाएंगे, यह बड़ा सवाल है। अचानक की गई इस पूर्ण बंदी से मामूली कमाई करने वाले जैसे- बेलदार, मिस्त्री, रेहड़ी वाले, छोटी-छोटी कंपनियों में अत्यंत कम मजदूरी पर काम करने वाले, पंजाब और हरियाणा में कृषि कार्यों में काम करने वाले दूरस्थ प्रदेशों यथा बिहार, मध्यप्रदेश और उड़ीसा से आए प्रवासी मजदूरों के सामने भूखों मरने की नौबत आ खड़ी हुई है। हालांकि सरकारें अपने स्तर पर इन्हें रोकने और इनकी मदद के प्रयास कर रही हैं, लेकिन ये पर्याप्त नहीं हैं। लोग अपने को असुरिक्षत मान रहे हैं।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

यह भेदभाव क्यों
कर्नाटक सरकार ने केरल के कासरगोड जिले के प्रवासियों को चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध न करवाने पर रोक लगा दी है, जिसके कारण कोरोना महामारी से दो लोगों की मौत हो गई है। यह भारतीय संघीय ढांचे का उल्लंघन है क्योंकि कोई भी राज्य अपनी सीमा को रोक नहीं सकता और कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के समय इसे रोकना मानवता को शर्मसार करता है। इसलिए इन सभी द्वंदों को त्याग कर सभी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को सर्वधर्म समभाव का पालन करना चाहिए। यह वक्त एकजुटता के साथ परिचय देने का वक्त है इससे ही भारत की एकता और अखंडता सुनिश्चित होती है।
’पारस मल बोस, गुडामालानी, बाड़मेर

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