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चौपाल: परस्पर जीवन

धरती की असली धरोहर है इसकी जैव विविधता। यह जैव विविधता ही धरती का चक्र चला रही है। वन, उपवन, बाग-बगीचे जो संसार में निर्मल जलवायु, तापमान संतुलन, साथ ही साथ खाद्य और जरूरी वस्तुओं का बंदोबस्त करता है। हिमालय, नदियां, पहाड़, पशु और पक्षी भी उतने ही जरूरी हैं।

धरती की विशेष धरोहर उसकी जैव विविधता है।

पल-पल बदलती जरूरतें, बदलते संसाधन, बदलती सोच, बदलते शौक और बदलती मानव सभ्यता। बदलाव वैसे तो हर प्राणी के जीवन का हिस्सा है, पर वह बदलाव तब तक सफल है, जब तक वह किसी दूसरे जीव या जंतु को अकारण प्रभावित न करे। अनेक जटिलताओं से भरपूर, सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों की मौजूदगी और कण-कण में समायोजित रहस्य। जीवन दायिनी धरती जितनी सुहावनी दिखती है, उतना आसान नहीं उसको समझना। धरती की विशेष धरोहर उसकी जैव विविधता है। धरती में सतासी लाख तरह के पशु, पक्षी, वनस्पति, पेड़ों और पौधों की प्रजातियों का निवास है। पर इस धरती की संरचना कुछ इस तरह है कि सभी जीव-जंतु एक दूसरे पर निर्भर है। चाहे वह भोजन हो या पानी या हवा हो या बरसात, जीवन का हर चक्र अकेले किसी प्राणी मात्र पर निर्भर नहीं है।

हर अगले क्षण हमें एक दूसरे की जरूरत है। लेन-देन की इस दुनिया में सबकी छोटी-बड़ी जिम्मेदारी है। पर अकेले इंसान ने अपने सुखों के लिए इस चक्र को हिला दिया है। ऐसे में सोचना पड़ता है कि क्या बदलाव सही दिशा में है? कहीं सुख-सुविधाओं मे वशीभूत होकर हम धरती को खत्म तो नहीं कर रहे हैं? कटते वृक्ष, र्इंधन का बढ़ता उपयोग, जल का दुरुपयोग, जीवों की तस्करी, बढ़ते उद्योगों, कल-कारखाने पर निर्भरता, अवैध खनन, जीव हत्या और अनेक तरीकों से मनुष्य ने इस धरती का तालमेल खराब कर दिया है। धरती सिर्फ मनुष्य लिए ही नहीं है। मनुष्य अपने स्वार्थों के लिए धरती की असली धरोहरों को भयानक नुकसान पहुंचा रहा है।

धरती की असली धरोहर है इसकी जैव विविधता। यह जैव विविधता ही धरती का चक्र चला रही है। वन, उपवन, बाग-बगीचे जो संसार में निर्मल जलवायु, तापमान संतुलन, साथ ही साथ खाद्य और जरूरी वस्तुओं का बंदोबस्त करता है। हिमालय, नदियां, पहाड़, पशु और पक्षी भी उतने ही जरूरी हैं। समय मनुष्य को कर्तव्य पालन करना और धरती की धरोहरों को प्राण वायु देना है। धरती को बर्बाद नहीं करना चाहिए। संतुलन से किया गया काम ही टिकता है। सुख-सुविधाओं की होड़ में मनुष्य अपने कल को ही खत्म करने में लगा है। आखिर संरक्षण है तो धरती है।
’सुनील चिलवाल, प्हल्द्वानी, उत्तराखंड

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