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चौपाल: प्रकृति का चक्र

प्रकृति जानती है कि उसे कब कहां, कैसे, क्या और कितनी मात्रा में करना है और वह कर देती है। यही जीवन चक्र है। प्रकृति सबसे खूबसूरत है, सबसे दूरदर्शी और सबसे समझदार भी।

मानव जाति की उत्पत्ति पर कई तरह के शोध हैं और उसका निष्कर्ष भी अलग-अलग है।

मानवशास्त्र के अनुसार आधुनिक मानव की उत्पत्ति केन्या और इथियोपिया की सीमा से संलग्न ‘तुकार्ना झील’ के आसपास रहने वाले लंगूरों और गोरिल्लों से हुई है। ये लंगूर और गोरिल्ले लगभग अठारह लाख साल पहले उर्ध्व मेरुदण्डी के रूप में और फिर बाद में आधुनिक मानव के रूप में सामने आए। अफ्रीका महादेश हम भारतीयों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि हमारा भारतीय उपमहाद्वीप भी पैंजिया के टूटने के बाद अफ्रीका के साथ गोंडवाना भूमि का हिस्सा था और ये दोनों नीचे अंटार्कटिक से जुड़े थे।

यही कारण है कि जबलपुर में परा-हिमानी निक्षेप मिलते हैं। इसका कारण प्लिस्टोसीन काल का हिम-युग नहीं है, बल्कि अफ्रीका और अंटार्कटिक महाद्वीप के साथ हमारे प्रगाढ़ संबंध हैं। ये सारे महादेश वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार भले ही टूट कर अलग हो गए हों, लेकिन ये एक थे और इसको प्रमाणित करने की कोशिश वेगनर ने ‘जिग सॉ फिट’ के अनुसार की है।

भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार एफएआर ट्रिपल जंक्शन से सोमालिया, अरेबियन और नुबियन प्लेट के अपसरण के कारण अफ्रीका महाद्वीप टूट रहा है, जिसके कारण यहां धरती के इतिहास की सबसे लंबी छह हजार चार सौ किलोमीटर भ्रंश घाटी का निर्माण हो गया है, जो अफ्रीकी भूमि को चीरते एशिया के जॉर्डन और लेबनान तक पहुंच गया है।

यह भ्रंश घाटी एक पूर्वी भाग में है और दूसरा पश्चिमी भाग में, जो अल्बर्ट, कीकु, न्यासा झीलों को समेटे नीचे जांबेजी नदी के मुहाने तक पहुंच गया है। विश्व की सबसे लंबी नील नदी का स्रोत विक्टोरिया झील भी इस पूर्वी और पश्चिमी भ्रंश घाटी के बीच में है। और तो और 2008 में इथियोपिया के डालाफिल्ला, 2013 में जायरे के न्यामुरागिरा में ज्वालामुखी उद्गार के साथ-साथ 2018 में नैरोबी-नैरोक राजमार्ग पर पड़े दरार इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्लेट एक दूसरे से दूर जा रहे हैं। मध्य महासागरीय कटकों का निर्माण भी रचनात्मक किनारों के अलगाव तथा नीचे से मैगमा ऊपर की ओर आने से हुआ है।

महज अपसरण के कारण ही विभ्रंशों एवं विभंगों का निर्माण नहीं होता है, बल्कि इसका निर्माण एक बाह्य बल यानी संकुचन बल के कारण भी होता है। कोबर महोदय के अनुसार पर्वत निर्माण भू-गति के अतिरिक्त भी एक गति होती है, जिसे क्रेटोजेनिक भू-गति कहते है। उनके अनुसार संकुचन के कारण जहां भू-सन्नतियों में गहराई तक वलन एवं रूपांतरण होता है, वहीं पृथ्वी के गोल होने के कारण दृढ़ भू-खंडों पर तनाव पड़ता है। इस तनाव बल के कारण स्थलीय भाग में विभ्रंशों एवं विभंगों का निर्माण होता है।

इसके कारण ब्लॉक पर्वत और हॉर्स्ट पर्वत और लावा पठारों का भी निर्माण होता है। भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार आने वाले हजार या लाख वर्षों में अफ्रीका महादेश के केन्या, इथियोपिया, इर्टिगा, जिबूती और सोमालिया जैसे देश अफ्रीकी मुख्य भूमि से अलग हो कर एक नये ‘नुबियन’ द्वीप समूह के साथ-साथ नुबियन महासागर का निर्माण करेंगे।

तो क्या अब आने वाले दिनों में विश्व की सबसे लंबी नदी की उपाधि अमेजन को प्राप्त होगी? क्या मानव जाति के सातों चरणों के विकास की गवाह रही यह अफ्रीकी भूमि बहुत उतार-चढ़ावों से गुजरने वाली है? नई विस्थापना होगी, नए लोग मिलेंगे, जुड़ेंगे, आपसी मेलजोल बढ़ेगा, एकात्म विचारों का उद्गम होगा और फिर नई सभ्यताओं और संस्कृतियों का उद्भव होगा।

नये नक्शे बनेंगे और नई चेतना जाग्रत होगी। यही तो प्रकृति है। प्रकृति जानती है कि उसे कब कहां, कैसे, क्या और कितनी मात्रा में करना है और वह कर देती है। यही जीवन चक्र है। प्रकृति सबसे खूबसूरत है, सबसे दूरदर्शी और सबसे समझदार भी।
’उद्भव शांडिल्य, दिल्ली विवि, दिल्ली

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