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चौपालः खौफ में स्त्री

अफसोस की बात यह है कि दिल्ली में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षा मंत्री जैसे लोगों के अलावा दिल्ली के पुलिस आयुक्त अपने तमाम जवानों के साथ हैं तो क्या ये लोग दिल्ली में बहनों-बेटियों की सुरक्षा तक नहीं कर सकते?

दर्जनों गुंडे नकाब पहन कर कभी जेएनयू परिसर में रात के अंधेरे में महिला छात्रावासों में घुस कर छात्राओं से लेकर महिला प्रोफेसरों तक पर हमला करके पुलिस के सामने से आराम से चले जाते हैं और दिल्ली पुलिस वाले मूक हाथ बांधे खड़े रहते हैं।

‘अपराधिक अराजकता’ (संपादकीय, 11 फरवरी) पढ़ा। यह लिखते हुए बहुत कोफ्त हो रहा है कि पिछले कुछ दिनों से आ रही खबरों के अनुसार ऐसा लग रहा है कि राजधानी दिल्ली में स्थानीय गुंडे और मवालियों का बोलबाला हो गया है। दर्जनों गुंडे नकाब पहन कर कभी जेएनयू परिसर में रात के अंधेरे में महिला छात्रावासों में घुस कर छात्राओं से लेकर महिला प्रोफेसरों तक पर हमला करके पुलिस के सामने से आराम से चले जाते हैं और दिल्ली पुलिस वाले मूक हाथ बांधे खड़े रहते हैं। जामिया मिल्लिया, शाहीन बाग और गार्गी कॉलेज में महिलाओं के खिलाफ जिस तरह का आतंक फैलाया गया, वह बहुत कुछ बताने के लिए काफी है।

खासतौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी महिला कॉलेज के सालाना उत्सव के मौके पर परिसर में घुस गए सैकड़ों लोग लड़कियों की मारपीट, छेड़छाड़ और अन्य घोर अश्लील हरकतें करते हैं। इस घटना में भी दिल्ली पुलिस और इस महिला कॉलेज की प्राचार्या की भूमिका जेएनयू जैसी ही रही। ऐसा लगता है कि दिल्ली पुलिस का कोई जवाब नहीं है! अफसोस की बात यह है कि दिल्ली में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षा मंत्री जैसे लोगों के अलावा दिल्ली के पुलिस आयुक्त अपने तमाम जवानों के साथ हैं तो क्या ये लोग दिल्ली में बहनों-बेटियों की सुरक्षा तक नहीं कर सकते? ये लोग आखिर दिल्ली में करोड़ों रुपए जनता के टैक्स के पैसे खर्च करके क्यों रहते हैं?

जब दिल्ली में कुछ गुंडों, मवालियों के सामने महिलाएं इतनी असुरक्षित, इतनी बेबस हैं, तो इस देश के सुदूर ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में महिलाओं, लड़कियों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। हम किस युग में जी रहे हैं, जहां हमारी बच्चियां देश की राष्ट्रीय राजधानी में दिन तक में भी इतनी असुरक्षित होकर रह गई हैं?
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

काम का चुनाव

अगर मध्यकालीन भारत को गौर से देखें तो दिल्ली की सत्ता के लिए कई कुर्बानियां दी गर्इं। वहीं आधुनिक भारत में सत्ता का केंद्रीकरण चेन्नई, मुंबई, कलकत्ता होते हुए दिल्ली तक पहुंचा। इस बार के दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान एक तरफ केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी ने प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री, तमाम कैबिनेट मंत्री और दिग्गज नेताओं को मैदान में उतारा। इन्होंने दिल्ली का चुनाव अपने परंपरागत शैली ‘राष्ट्रवाद’ और ‘धर्म’ के आधार पर लड़ा। दूसरी तरफ नई नवेली पार्टी, जिसका उद्भव हुए मात्र छह वर्ष हुए हैं, इसने पिछले पांच वर्षों के कामकाज के आधार पर चुनाव मैदान में उतरी।

आम आदमी पार्टी की तरफ से दिल्ली की कमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने संभाली। ‘आप’ ने पिछले पांच वर्षों में दिल्ली में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी जैसे मूलभूत मुद्दे पर चुनाव को लड़ा। एक तरफ इनके ऊपर यह आरोप भी लगे कि जनता के टैक्स के पैसे का दुरुपयोग कर रहे हैं, लेकिन संविधान में ‘नीति-निदेशक तत्त्व’ के अंतर्गत लोककल्याण कारी राज्य की अवधारणा भी निहित है। इसी लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा को दिल्ली की जनता ने सराहा है।
’नीरज गुप्ता, वाराणसी, उप्र

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