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चौपालः हाशिये पर किसान

कई दशकों से जीडीपी ही देश की कृषि और किसानों का विकास है। क्या आपको लगता है कि सरकार जीडीपी के घोषित लक्ष्य को पा लेती है?

Author June 10, 2017 2:34 AM
सरकार द्वारा दी गई मुआवजा राशि का चैक दिखाते सूबे के किसान (फोटो सोर्स एएनआई)

कई दशकों से जीडीपी ही देश की कृषि और किसानों का विकास है। क्या आपको लगता है कि सरकार जीडीपी के घोषित लक्ष्य को पा लेती है? न भी पाए तो मीडिया के विभिन्न माध्यमों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर मुनादी करवाई जाती है कि इस बरस रिकार्ड उत्पादन हुआ है। बेशक मुनाफा और उत्पादन बढ़ता भी है आंकड़ों में लेकिन उसका सीधा लाभ सरकार के खजाने को मिलता है किसानों को नहीं। जीडीपी को हम गलत नहीं ठहरा रहे पर जादुई आंकड़े के बीच जो दब जाता है उसे कितने लोग समझ या महसूस कर पाते हैं?

हम जीडीपी के मीटर पर विकास को तो नाप लेते हैं लेकिन मौसम, संसाधन, आपदा, कर्ज और जीतोड़ परिश्रम के अलावा माथे पर उभरी शिकन और चेहरे की झुर्रियों को कैसे भूल जाते हैं? सरकार ने अनुमानित लक्ष्य आंकड़ों को तोड़-मरोड़ कर प्राप्त कर लिया। देश की अर्थव्यवस्था ने विपक्ष के लिए मील का पत्थर गाड़ दिया। लेकिन इसके आगे भी कुछ है जनाब। वह यह कि आखिर क्यों आपके विकास की सड़क से किसान औंधे मुंह अंधेरे गड््ढे में लगातार गिरते जा रहे हैं? किसान के कच्चे माल से कंपनियां उत्पाद बना कर कुछेक वर्षों में करोड़ों की मालिक हो जाती हैं लेकिन किसान कई दशकों से खेत-खाट पर बैठा यही सोचता आ रहा है कि अगली फसल कैसे बोई जाएगी, सींची जाएगी, आदि-इत्यादि। देश आर्थिक विकास कर रहा है पर किसान उससे छिटकता जा रहा है। सरकारें, नीति आयोग और कृषि मंत्रालय अपने मुंह में लकड़ी का गत्ता फंसा कर खूब चीखते हैं, किसानों की दुर्दशा पर लेकिन उनकी इस चिंता की हकीकत हम-आप सब जानते हैं।

अब बारी आती है कृषि वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों की। ये लोग उपलब्ध संसाधनों, तकनीक, प्रतियोगिता और संभावना को ध्यान में रख कर प्रभावी और लचीला मॉडल बनाते हैं। कई कारगर भी हुए हैं। इससे अनेक बदलाव भी आए जिनसे देश की दशा-दिशा और तकदीर को सुनहरा लिबास पहनाया गया। पर विडंबना देखिए कि कोई भी मॉडल गढ़ते समय कृषि वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों की नजर किसान, मजदूर, सरकार और बाजार सब पर बराबर रहती है पर सरकार और कापोर्रेट के गठजोड़ में सारा मुनाफा पूंजीवादी कंपनियों की झोली में चला जाता है। आर्थिक विकास का मतलब होता है ‘एक बेहतर दुनिया रचने की कोशिश’। मगर यहां जमीन पर तो कुछ और ही हो जाता है।

कुलजमा सवाल है कि अर्थशास्त्र के प्रचलित आदर्श और मॉडल की सीधी टक्कर सरकार और पूंजीवादी कंपनियों से होती है और इस हादसे में अपना सब कुछ झोंककर भी सोने-सा दिल रखने वाले किसानों को निराशा हाथ लगती है। देश के नीति नियंता अब भी सावधान हो जाएं नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब किसान लहलहाती फसल को आग के हवाले करने लगेंगे। तब विकास के आंकड़ों के छद्म पानी के छींटे इस आग को बुझा नहीं पाएंगे।
मतभेद और मुगालतों से किनारा कर नई नीतियां बनाइये। बंदरबांट बंद करिए और लोकतांत्रिक संस्थाओं को नए सिरे से समेकित कीजिए जिससे चौड़ी होती खाई में मिट्टी भरी जा सके। सबसे जरूरी बात, लोगों की बेहतरी के रास्ते को उनके घर तक पहुंचाया जाए, सरकारी दफ्तरों की धूल फांकती फाइलों में नहीं।
’पवन मौर्य, बनारस

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