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चौपालः हिंसा की अति

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, जिनका उदय धरने से हुआ और वे धरने का दूसरा रूप माने जाते हैं, उनकी खामोशी भी हलक से नीचे नहीं उतर रही है। अगर समय रहते वे सड़क पर उतरे होते तो शायद जिनकी जान गई आज वे जिंदा होते और जनसंहार रुक सकता था। ऐसा करने पर उनकी गांधीगीरी को सत्य माना जा सकता था। मगर उन्होंने भी दिल्ली लूटने के बाद आम राजनीतिक की तरह अपनी भूमिका निभाई।

Author Updated: February 28, 2020 3:04 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

पिछले चार पांच दिनों से देश की राजधानी दिल्ली में जंगलराज का-सा माहौल बना हुआ था, गंगाजमुनी एकता पर चोट हो रही थी और देश के जिम्मेदार शायद सो रहे थे। आज सब के सब कठघरे में हैं। ऐसे हालात पर सवाल उठना लाजमी है कि इसमें कोई षड्यंत्र तो नहीं? आखिर यह किसकी शह पर तांडव हुआ। वह भी तब जब दिल्ली हाई अलर्ट पर थी, क्योंकि दुनिया का शक्तिशाली व्यक्ति कहा जाने वाला व्यक्ति यानी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प भारत के दौरे पर थे, बल्कि उस दिन वे दिल्ली में मौजूद थे। अनुमान लगाया जा रहा है कि 1984 के सिख दंगों से भी बड़ी यह घटना हुई है।

यह कानून व्यवस्था का मजाक ही है कि अगर राजधानी सुरक्षित नहीं है तो सरकार देश की अन्य जगहों पर ऐसी घटनाओं से भला क्या सुरक्षा देगी। जिस शहर में दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति मौजूद हो, देश के गृहमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति की उपस्थिति हो, वहां ऐसा तांडव! तो सवाल उठना लाजमी है। जहां पर पुलिस मूक दर्शक दिखी और उत्पातियों ने खुल कर तांडव किया। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, जिनका उदय धरने से हुआ और वे धरने का दूसरा रूप माने जाते हैं, उनकी खामोशी भी हलक से नीचे नहीं उतर रही है। अगर समय रहते वे सड़क पर उतरे होते तो शायद जिनकी जान गई आज वे जिंदा होते और जनसंहार रुक सकता था। ऐसा करने पर उनकी गांधीगीरी को सत्य माना जा सकता था। मगर उन्होंने भी दिल्ली लूटने के बाद आम राजनीतिक की तरह अपनी भूमिका निभाई।

अचरज की बात एक और हुई कि जिस हाई कोर्ट के जस्टिस मुरलीधर ने पुलिस कार्यवाही का संज्ञान लिया उनके तबादले का फरमान जारी हो गया। यह भी संविधान से खिलवाड़ ही कहा जा सकता है। इसी तरह के फैसले पहले भी महाराष्ट्र में सरकार बनाने के दौरान देश ने देखा है। देश के ऐसे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को उस पद की गरिमा का खयाल रखना चाहिए था। चौरासी के दंगों की तरह दिल्ली में राजनीतिक पार्टियों को एक और मुद्दा मिल गया, अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने का। मगर उनका क्या होगा, जिनके चूल्हे हमेशा के लिए बुझ गए?
’मोहम्मद आसिफ, जामिया नगर, दिल्ली

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