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चौपालः बाढ़ की विभीषिका

नदियों के किनारे अधिक से अधिक वृक्षारोपण कर भूमि कटाव को कम किया जना चाहिए। उनके किनारे बसे कस्बों एवं शहरों में जो विस्तार या विकास हो रहा है उसमें पानी की उचित निकासी की ओर ध्यान दिया जाना भी जरूरी है।

भारत विश्व के उन देशों में से है जहां प्रतिवर्ष किसी न किसी भाग में बाढ़ आती रहती है।

नदियों में हर साल आने वाली बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है जो विश्व के अनेक भागों में करोड़ों रुपयों की संपत्ति को निगल जाती है। गांव के गांव पलक झपकते ही जल समाधि ले लेते हैं। हरे-भरे खेत, लहलहाती फसलें, बाग-बगीचे, घर आदि देखते-देखते नदियों की तेज धारा के साथ बह जाते हैं। अनगिनत पेड़-पौधे और दुर्लभ वनस्पतियां पानी के बहाव के साथ विलीन हो जाती हैं। सैकड़ों लोग और लाखों पशु बाढ़ की भेंट चढ़ जाते हैं।

भारत विश्व के उन देशों में से है जहां प्रतिवर्ष किसी न किसी भाग में बाढ़ आती रहती है। केंद्र और राज्य सरकारें बाढ़ की विभीषिका को कम से कम करने के लिए योजना काल से ही प्रयत्नशील हैं। पंचवर्षीय योजनाओं में अलग से धन की व्यवस्था की जाती है। इस दिशा में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। जलग्रहण क्षेत्रों में जगह-जगह ‘चेकडैम’ बना कर और तटबंध व जलाशयों का निर्माण करके बाढ़ को नियंत्रित किया जा सकता है। जिन क्षेत्रों में ऐसा कर लिया गया है वहां बाढ़ की विभीषिका काफी हद तक कम हो गई है। इसके अलावा भूमि की अत्यधिक कटाई कर खेती योग्य भूमि बनाने या वृक्षों की कटाई पर नियंत्रण लगा कर हम बाढ़ से राहत पा सकते हैं।

नदियों के किनारे अधिक से अधिक वृक्षारोपण कर भूमि कटाव को कम किया जना चाहिए। उनके किनारे बसे कस्बों एवं शहरों में जो विस्तार या विकास हो रहा है उसमें पानी की उचित निकासी की ओर ध्यान दिया जाना भी जरूरी है। गंदे नालों की सफाई समय से कराई जाए। शहर के निचले इलाकों में मकान न बना कर वहां पार्क एवं खेलकूद के मैदान आदि बनाए जाएं। बाढ़ के हालात पैदा होने से रोकने के लिए प्रतिरोधात्मक उपाय किए जाना बहुत जरूरी है। इन उपायों से बाढ़ और जल प्लावन की स्थिति उत्पन्न न होने देने में सहायता मिलेगी।
’संजय कुमार, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

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