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चौपालः लूट की होड़

ट्रेनों के फ्लेक्सी या डायनेमिक किराए में चाल यह है कि जो रेलयात्री अपनी यात्रा तिथि के मुताबिक किसी मजबूरी में जितना नजदीक यात्रा टिकट लेगा, वह उतना ही महंगा होता जाएगा।

Author Updated: October 11, 2019 2:26 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

भारत की आम गरीब जनता पहले से ही यहां मजबूती से अपने पांव जमाए जमाखोरों, सूदखोरों, शिक्षा माफिया-भूमाफिया, ब्लैक मार्केटिंग करने वालों, तस्करों, चोरों से त्रस्त और परेशान थी। अब जनसुविधा और जनकल्याण के नाम पर जनता को लूटने-खसोटने की कोशिश लगातार चल रही है। मसलन, भारतीय रेलवे के माध्यम से आम जनता से पैसा वसूली ऐसा काम किया जा रहा है, जिसके पीछे उचित तर्क नहीं दिख रहा।

कुछ समय पूर्व भारत सरकार के नीति-निमार्ताओं ने जोर-शोर से यह घोषणा की थी कि हम भारतीय रेलवे में भी विभिन्न एयरलाइंस की तरह फ्लैक्सी या डायनेमिक किराया लागू करेंगे। अब आम गरीब जनता को कैसे इस नई व्यवस्था में लूटा जा रहा है, वह रोज देखने को मिल जाता है। सरकार ने छठ, दीपावली या दशहरे जैसे त्योहारों के मौके पर भारतीय रेलवे की तरफ से खूब प्रचार किया था कि वह आम जनता की सुविधा और सहूलियत के लिए जरूरत भर की ‘सुविधा’ ट्रेनें चला रही है। इन ट्रेनों में डायनेमिक किराया लागू है। इस त्योहारी मौसम में भारत का कोई गरीब व्यक्ति भी अपनी नौकरी से साल में कम से कम एक बार अपने परिवार के साथ हंसी-खुशी के साथ त्योहार मनाए। जाहिर है, इस समय कई करोड़ लोग भारत की जीवन रेखा कही जाने वाली भारतीय रेल से ही यात्रा करना पसंद करते हैं। रेल यात्रा का विकल्प भी उनके पास नहीं है।

ट्रेनों के फ्लेक्सी या डायनेमिक किराए में चाल यह है कि जो रेलयात्री अपनी यात्रा तिथि के मुताबिक किसी मजबूरी में जितना नजदीक यात्रा टिकट लेगा, वह उतना ही महंगा होता जाएगा। मसलन जयपुर से सूरत का किराया 5000 रुपए से भी ज्यादा हो जा सकता है! अब प्रश्न है कि सरकार के नीति-नियंता आम जनता को सुविधा दे रहे हैं या लूट रहे हैं! दूसरी तरफ सरकार चुपचाप बड़े पूंजीपतियों के जानबूझ कर बैंकों से लिए कर्ज को न चुकाने पर लाखों करोड़ रुपए आसानी से ‘माफ’ कर देती है। इसकी क्या सफाई है?

अब सोचने वाली बात है कि वर्तमान में यह कथित लोकतांत्रिक सरकार कितनी लोकतांत्रिक और लोकहितकारी है! कितने दुख और अफसोस की बात है कि भारत की सरकारें यहां के नीति-निर्धारक और कथित अर्थशास्त्री विकसित देशों की नीतियों का अनुसरण करने में देर नहीं करते, जिनकी वजह से आम गरीब भारतीय का और भी शोषण होने लगता है। जबकि विकसित देशों में जनकल्याणकारी कार्यों का मतलब वहां की शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था निशुल्क है। वहां की सड़कें, शौचालय, पेयजल की व्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन, रेल यातायात की व्यवस्था गुणात्मक रूप से इतनी अच्छी हैं कि वहां का आम आदमी का जीवन बहुत ही सुख और शांति से बीतता है। फिर मन में यह बात बार-बार कौंधती है कि हमारे देश की सरकारें विकसित देशों की इन अच्छी चीजों की नकल क्यों नहीं करतीं?
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

सुकून के लिए
आजकल अखबारों में दिल्ली सरकार के बड़े-बड़े विज्ञापनों में दिल्ली में प्रदूषण कम होने का दावा किया गया है। इसके कारण प्रदूषण की व्यापक समस्या पर फिर से बहस शुरू हो गई है। गौरतलब है कि पिछले चार-पांच सालों से दिल्ली में अक्तूबर-नवंबर माह में दिवाली, पटाखे, पराली, औद्योगिक संयंत्र, वाहनों और निर्माण कार्य के चलते प्रदूषण और पार्टिकुलेट मैटर 2.5 का बढ़ता स्तर जानलेवा होता जा रहा है। इस समय पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान अगली गेहंू की फसल लगाने की जल्दी में धान की खेती के अवशेषों को खेतों में ही जला देते हैं, जिससे उत्तर भारत के बड़े क्षेत्र में प्रदूषण हो जाता है। ये प्रदूषित हवा बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को बहुत नुकसान पहुंचाती है।

हालांकि राष्ट्रीय हरित पंचाट पराली को 2015 में ही प्रतिबंधित कर चुका है, फिर भी पराली जलाने की घटनाएं बंद नहीं हुई हैं। केंद्र ने भी अपने स्तर पर इस समस्या से निपटने के लिए अलग से कोष बनाया है, जिससे करोड़ों रुपए की सहायता राशि हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश को जारी की गई है, ताकि किसान को आर्थिक मदद देकर पराली जलाने की बजाय उसे वैज्ञानिक एवं तकनीकी मदद से निष्पादित किया जा सके।

लांसेट प्लेनेटरी हेल्थ जर्नल की ग्लोबल स्टडी बताती है कि भारत में प्रदूषण जनित बीमारियों के कारण बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही है। इसमें जीवन प्रत्याशा में कमी से लेकर सांस, मधुमेह, दिल और स्ट्रोक से होने वाली मौतें शामिल हैं। अब समय आ गया है कि दिल्ली सरकार और केंद्र मिल कर इस प्रदूषण की समस्या से युद्धस्तर पर लोहा लें, ताकि अमूल्य जानें बचें और दिल्लीवासियों को स्वच्छ हवा मिले और वे सुकून की सांस ले सकें।
’बिजेंद्र कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय

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