ताज़ा खबर
 

चौपालः दावे और हकीकत

ऑटोमोबाइल क्षेत्र में बीस हजार नौकरियां जा चुकी हैं, दस लाख पर तलवार लटकी है। गाड़ियों पर छूट और ‘ऑफर्स’ की भरमार है, लेकिन ढूंढ़े से नहीं मिल रहा खरीदार है, लिहाजा ठप सारा कारोबार है। रियल एस्टेट सेक्टर तो खैर चार साल से बीमार है, असंगठित क्षेत्र के लाखों सरिया, शटरिंग, ईंट-भट्ठा-चिमनी मजदूर लाचार हैं।

Author Published on: August 20, 2019 2:59 AM
M-Cap, BSE, NSE, Nifty, Sensex, शेयर मार्केट, RIL, ITC, Top losses, TCS, RIL M-Cap, Indian Companies, market valuation, ITC M-Cap, TCS M-Cap, Business biz business hindi news, hindi news, latest news, jansatta newsतस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Indian express)

पिता रोजाना ‘आईटी सेल’ के आका के निर्देश पर दुनिया की सबसे तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था, मुद्रा योजना से करोड़ों युवाओं को कारोबार मिलने, मेक इन इंडिया से रोजगार मिलने के प्रेरणादायी ‘पोस्ट’ करते ही रह गए और कंप्यूटर इंजीनियर बेटा साथियों की लगातार हो रही छंटनी से घबरा कर दुनिया को अलविदा कह गया। झारखंड के जमशेदपुर के बाराडीह मंडल भाजपा आईटी सेल के सह संयोजक कुमार विश्वजीत के इकलौते बेटे कुमार आशीष की मौत के पीछे यही कहानी वहां के अखबारों में भी आई है और सोशल मीडिया पर भी चल रही है। यह हैरान करने वाली बात है क्योंकि रोटी, रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों पर तो हमने अरसे से किसी को बोलते-सुनते नहीं देखा। वैसे भी जब हिंदू-मुसलमान, इमरान-पाकिस्तान, आजम-ओवैसी-टीपू के अलावा नेहरू-सोनिया-राहुल-प्रियंका का सदाबहार राष्ट्रीय मुद्दा हो तो फिर रोजगार, कारोबार जैसे घिसे-पिटे-सड़ेले विषय पर कोई क्यों बोले और सुने!

ऑटोमोबाइल क्षेत्र में बीस हजार नौकरियां जा चुकी हैं, दस लाख पर तलवार लटकी है। गाड़ियों पर छूट और ‘ऑफर्स’ की भरमार है, लेकिन ढूंढ़े से नहीं मिल रहा खरीदार है, लिहाजा ठप सारा कारोबार है। रियल एस्टेट सेक्टर तो खैर चार साल से बीमार है, असंगठित क्षेत्र के लाखों सरिया, शटरिंग, ईंट-भट्ठा-चिमनी मजदूर लाचार हैं। आप नोएडा सेक्टर 62 के लेबर चौक पर दिहाड़ी के लिए दोपहर तक इंतजार करते और फिर खाली हाथ वापस घर जाते लोगों को किसी भी दिन देख सकते हैं। कमाई घटी है तो भरपाई के लिए छंटनी निकट भविष्य में तय ही मानिए। अब आप भले कितना ही नारा लगा लें कि गो लोकल, यानी स्थानीय कारोबार को बढ़ावा दें, लेकिन यह घड़ी की सुइयां उल्टी घुमाने जैसा है कि दो दशक गो ग्लोबल और अब गो लोकल! वैश्विक अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो रही है तो असर ग्लोबल भी दिख रहा है और लोकल भी दिखना ही है!

रोजगार को लेकर हर सरकार, मौजूदा सरकार भी वादा निभाने में नाकाम रही, भले ही यह बात किसी को चुभे, लेकिन यह सच है। दो करोड़ रोजगार सालाना भी एक चुनावी वादा था, भले ही अब समर्थक दलील दें कि इस वादे से पहले तो सब कलेक्टर थे, लेकिन हमें नहीं लगता कि पूरा कार्यकाल मिला कर भी दो करोड़ नौकरियां मुहैया कराई गई होंगी। निजी क्षेत्र में सत्ता की करीब दो-चार कंपनियों को छोड़ दें तो ज्यादातर खस्ताहाल हैं, सबने मुट्ठी बंद कर रखी है, जबकि सूचकांक-शेयर बाजार सकारात्मक रुझान भी दिखाते रहे हैं। यह विरोधाभास क्यों है?
मो ताबिश, जामिया मिल्लिया, नई दिल्ली

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 चौपाल: प्लास्टिक पर पाबंदी
2 चौपाल: संकट का दौर
3 चौपाल : कागजरहित कार्यवाही, जनसंख्या नियंत्रण और पाक का फर्जीवाड़ा
ये पढ़ा क्या?
X