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चौपालः दिल्ली का संदेश

एक बार फिर यह सिद्ध हुआ है कि प्रांतीय मसले के सामने राष्ट्रीय मुद्दे शीतनिष्क्रियता की भेंट चढ़ गए हैं। पराजय के कारणों के असली अन्वेषण अगर भाजपा राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के तुरंत बाद अगर करती और अपनी रणनीति में प्रभावी परिवर्तन करती तो झारखंड और अभी दिल्ली में ढहते दुर्ग की रक्षा की जा सकती थी।

Author Published on: February 13, 2020 2:38 AM
Arvind Kejriwal तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि 16 फरवरी को को वह सीएम पद की शपथ लेंगे। राजनीति में आने के बेहद कम समय के अंदर ही दिल्ली में केजरीवाल की लोकप्रियता और प्रचंड जीत चर्चा का विषय है। हालांकि आज जिस जीत के लिए आम आदमी पार्टी को लोगों की तालियां मिल रही हैं उसके पीछे अरविंद केजरीवाल की एक टीम है। ये कोर टीम पर्दे के पीछे से पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए जी जान से जुटी रही। आइए जानते हैं इस कोर टीम में कौन लोग हैं शामिल: (AP Photo/Manish Swarup)

दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे एक साथ कई संदेश देते नजर आ रहे हैं। जनता-जनार्दन ने लुभावने नारों और भावनात्मक मुद्दे, जिसमें विकास की न कोई कथा हो और न उनकी व्यथा का निदान हो- उससे अपने को किनारे रखते हुए सिर्फ जनकल्याणा के लिए फलित होते कार्यों को कसौटी पर परखते हुए ही अपना अमूल्य वोट लोकतंत्र को समर्पित किया है। दिल्ली चुनाव के निहितार्थ अब दलीय पंडितों को अपने अंतर्मन में बैठे नीर क्षीर को पूर्वाग्रह परिधि से मुक्त करना होगा और अपने मतदाताओं के बुनियादी सुविधाओं की पूर्ति के लिए कमर कसना होगा।

एक बार फिर यह सिद्ध हुआ है कि प्रांतीय मसले के सामने राष्ट्रीय मुद्दे शीतनिष्क्रियता की भेंट चढ़ गए हैं। पराजय के कारणों के असली अन्वेषण अगर भाजपा राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के तुरंत बाद अगर करती और अपनी रणनीति में प्रभावी परिवर्तन करती तो झारखंड और अभी दिल्ली में ढहते दुर्ग की रक्षा की जा सकती थी। अतिशय आत्मविश्वास, कुछ नेताओं के बड़बोलेपन, मतदाताओं के नब्ज को टटोलने की टालू नीति, आक्रामकता की अंगड़ाई और मोदी मंत्र पर आलस्य आश्रय कुछ प्रमुख कारण हैं, जिसने भाजपा को एक बार फिर हार की राह दिखाई है।

दिल्ली का यह परिणाम भविष्य में होने वाले राजकीय चुनावों के लिए एक ‘लिटमस टेस्ट’ की तरह है, जहां भाजपा के विरोध में ध्रुवीकरण तेजी से संभावित है और उनके बिखरे मतों के एकीकरण से नए समीकरण सत्ता प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। चुनाव प्रचार में मतदाता अब गैर-उत्पादकीय और भावनात्मक मुद्दों के शंखनाद से ऊबने लगी है, इसलिए लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा अब मात्र विकास के असली सूत्रों से ही की जा सकती है।

पिछले छह महीने से अरविंद केजरीवाल विरोध के लिए मात्र विरोध के मंच से अपने को जिस प्रकार दूर कर जन-जन के द्वार पर अपने पांच वर्षों का कार्य ब्योरा पेश किया और मौन शक्ति से सत्ता समर में विजय पताका फहराया, वह भाजपा के लिए अनुशीलन का विषय है। दिल्ली दंगल से निकले वर्तमान संदेश दलों के लिए अनुकरणीय हो सकते हैं कि चुनाव प्रचार में अब निजी हमले, विद्वेष, सांप्रदायिक तनाव और अस्वस्थ ध्रुवीकरण का कोई न तो मूल्य है और न उसकी प्रासांगिक महत्ता।
’अशोक कुमार, पटना

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