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चौपालः संविधान के साथ

भारत के संविधान में अनुच्छेद पांच से तेरह तक साफ लिखा हुआ है कि नागरिकता देने या न देने का अधिकार भारत की संसद को है। इसके लिए वह कानून बना सकती है, यह संघ का कार्यक्षेत्र है, इसमें राज्य सरकारों का कोई लेना-देना नहीं है।

Author Updated: January 28, 2020 3:02 AM
भारत के संविधान में अनुच्छेद पांच से तेरह तक साफ लिखा हुआ है कि नागरिकता देने या न देने का अधिकार भारत की संसद को है। इसके लिए वह कानून बना सकती है, यह संघ का कार्यक्षेत्र है, इसमें राज्य सरकारों का कोई लेना-देना नहीं है।

देश को उसका सबसे पवित्र ग्रंथ समर्पित करते हुए बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि यह ऐसी किताब है जो युद्ध काल में भी देश की रक्षा करेगी और शांतिकाल के लिए भी प्रासंगिक होगी। सात दशक हो गए देश में संविधान को लागू हुए। बड़ी-बड़ी संवैधानिक जटिलताएं खड़ी हुईं, लोकतांत्रिक मूल्य संकट में नजर आए। प्राकृतिक आपदाएं आईं। पड़ोसी देशों से जंग हुई। आपातकाल का काला अध्याय भी देखा। पर संविधान अपने नियमों-उपबंधों के कवच से देश को हर प्रतिकूल हालात से उबारता रहा। आज जो लोग यह सोच रहे हैं कि संविधान बदला जा सकता है वे या तो नादान और अज्ञानी हैं या फिर उन्होंने संविधान पढ़ा नहीं है।

दरअसल, कोई भी ताकत हमारे संविधान के मूल स्वरूप को नहीं बदल सकती। अनुच्छेद 368 में लिखा हुआ है कि संसद भारत के संविधान में संशोधन कर सकती है। संशोधन 103 बार किया भी जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट साफ कर चुका है कि संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है लेकिन मूल ढांचे में संशोधन करने का अधिकार उसे नहीं है। संविधान का मूल ढांचा संघीय व्यवस्था, प्रजातंत्र, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकार और धर्मनिरपेक्षता है। लोग बिना वजह की भ्रांतियां फैला रहे हैं।

जब देश की संसद ही मूल ढांचे को बदल नहीं सकती तो फिर देश को हिंदू राष्ट्र या मुसलिम राष्ट्र बनाने की बात कहां से खड़ी हो गई? ये सभी बातें पूरी तरह से गलत हैं। जो लोग ऐसा कह रहे हैं उनकी बातों से लगता है कि उन्होंने संविधान पढ़ा ही नहीं है। अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाए जाने का इससे कोई संबंध नहीं है। तीन तलाक का भी इससे कोई लेना-देना नहीं है। राजनीतिक पार्टियों का अपना एजेंडा होता है। वे बहुमत लेकर आती हैं। उन्हें क्या काम करना है इसे चुनाव के समय बाकायदा अपने घोषणा पत्र में जनता के सामने रखती हैं। केंद्र सरकार अपने घोषणा पत्र में कही गई बातें अमल में ला रही है।

भारत के संविधान में अनुच्छेद पांच से तेरह तक साफ लिखा हुआ है कि नागरिकता देने या न देने का अधिकार भारत की संसद को है। इसके लिए वह कानून बना सकती है, यह संघ का कार्यक्षेत्र है, इसमें राज्य सरकारों का कोई लेना-देना नहीं है। केंद्र सरकार ने नागरिकता कानून में जो संशोधन किया उसके मुताबिक इस्लामिक देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से धार्मिक आधार पर उत्पीड़न के शिकार जो हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध या पारसी अल्पसंख्यक आएंगे उन्हें चाहे तो केंद्र सरकार नागरिकता दे सकेगी। इस पर सारा बवाल खड़ा हुआ है।

कुछ राज्य सरकारें कह रही हैं कि हम इसे लागू नहीं करेंगे। संसद के दोनों सदनों ने यह कानून पास किया है, उन दोनों सदनों में सभी प्रदेशों के सांसद और प्रतिनिधि भी हैं। यह कानून राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद अधिसूचित होकर लागू भी हो गया। अब कहा जा रहा है कि इसे वापस ले लो! इसे वापस करने के दो ही तरीके हैं। पहला, सुप्रीम कोर्ट कहे कि यह संविधान के खिलाफ है। दूसरा, विपक्ष आगामी लोकसभा चुनाव में बहुमत लेकर आए और अपनी सरकार बनने पर इस कानून को फिर से बदल दे। इसके अलावा तीसरा कोई रास्ता नजर नहीं आता।
’दिपिका शर्मा, सूरजकुंड, गोरखपुर

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