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घाटी की शांति

कश्मीर के लोगों का, खासकर युवाओं का दुरुपयोग कर घाटी में अशांति फैलाने वाले नहीं चाहते कि बातचीत सफल हो सके।

Author October 25, 2017 2:09 AM
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह (एजेंसी फाइल फोटो)

दिक्कतों की वजह

दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति अगर अपने कर्तव्य का ईमानदारी से निर्वहन करे तो किसी को कोई दिक्कत ही नही होगी। कुछ अपवाद छोड़ दें तो लोगों का नैतिक स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। घर-बाहर, दफ्तर कहीं भी जा कर देखें तो कामचोरों की बहुतायत है। साथ ही भ्रष्टाचारियों की भी लाइन लगी है। राजनेता वोट बैंक की खातिर मतदाता को न उलझाते और ईमानदारी से काम करते तो गरीबी आज मिट चुकी होती। अधिकार से ज्यादा आज लोगों में दायित्वबोध जगाने की आवश्यकता है।
’मिथिलेश कुमार, भागलपुर
घाटी की शांति
जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति की तलाश में बातचीत का सिलसिला एक बार फिर शुरू होने जा रहा है। सत्ता में जो भी सरकार आती है, वह बातचीत के जरिए घाटी में शांति तलाशने की कोशिश करती है। लेकिन आज तक इसमें सफलता नहीं मिली। सरकारी वार्ताकारों के साथ बातचीत करने वाली हुर्रियत जैसी पार्टियां एक तरफ तो बातचीत का नाटक करती हैं और दूसरी तरफ कश्मीर में अशांति फैलाने में भी लगी रहती हैं। इसी वजह से कश्मीर में बातचीत का सिलसिला कभी आगे नहीं बढ़ पाया है। कश्मीर के लोगों का, खासकर युवाओं का दुरुपयोग कर घाटी में अशांति फैलाने वाले नहीं चाहते कि बातचीत सफल हो सके।
पाकिस्तान से पैसे लेकर घाटी में अशांति फैलाने वालों की कमी नहीं है। इन लोगों के कारण पाकिस्तान को घाटी में उपद्रव फैलाने में आसानी हुई है। अब तो ऐसा लगने लगा है कि बातचीत भी अब शायद ही शांति बहाली ला पाए। कश्मीर की समस्या को धर्मविशेष से भी जोड़ दिया गया है। लेकिन अब विचारों में परिवर्तन जरूरी है। सही मायने में यही कश्मीर की शांति का मार्ग है।
’मानसी जोशी, मुंबई
महापुरुषों की राह
जीत-हार से बढ़ कर है महान उद्देश्य के लिए किया गया संघर्ष। यह भी सच है कि समय से आगे की बात कहने वालों को अपने समय में विरोध का सामना करना पड़ा है। लेकिन आगे चलकर उन्हें ही महापुरुष मान कर पूजा जाता है। उनके बताए मार्गों का अनुसरण किया जाता है। सारांश यह है कि जो गलत है, वह गलत ही रहेगा और जो सही वह सही ही रहेगा। जीत और सफलता एक अवसर मात्र है। इसलिए अंतरात्मा की आवाज को दबाए रखूं, यह समझदारी नहीं कायरता है।
’ देवेंद्र जोशी,उज्ज्जैन

लेटलतीफी
रेलवे हो या कोई और विभाग। देखा जाता है कि परियोजनाएं पूरी होने में दस-दस साल लग जाते हैं। काम में इसी लेटलतीफी के कारण परियोजनाओं की लागत बढ़ती जाती है। इसे रोका जाना चाहिए। जितना जल्दी हो सके, उतना।
’राधेश्याम ताम्रकर, इंदौर

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